<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386</id><updated>2011-08-19T02:48:44.360-07:00</updated><title type='text'>Gandhiwadi (गांधीवादी)</title><subtitle type='html'>आदर्श, सत्य, अनुकरणीय, मनोरंजक, ज्ञानवर्द्धक सामग्री</subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><generator version='7.00' uri='http://www.blogger.com'>Blogger</generator><openSearch:totalResults>34</openSearch:totalResults><openSearch:startIndex>1</openSearch:startIndex><openSearch:itemsPerPage>100</openSearch:itemsPerPage><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-6924251545103536325</id><published>2011-08-19T02:48:00.000-07:00</published><updated>2011-08-19T02:48:44.371-07:00</updated><title type='text'>#comment-form</title><content type='html'>&lt;a href="http://khojkhabar-pandeyhariram.blogspot.com/2011/04/blog-post_02.html#comment-form"&gt;#comment-form&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-6924251545103536325?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='related' href='http://khojkhabar-pandeyhariram.blogspot.com/2011/04/blog-post_02.html#comment-form' title='#comment-form'/><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/6924251545103536325/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=6924251545103536325' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/6924251545103536325'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/6924251545103536325'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2011/08/comment-form.html' title='#comment-form'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-7893617074900399799</id><published>2011-08-18T02:58:00.000-07:00</published><updated>2011-08-18T02:58:14.483-07:00</updated><title type='text'>हमारे महात्मा ऐसे भी थे</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधीजी ने अपनी आत्मकथा ‘सत्य के प्रयोग’ में जिस तरह चैंकाने वाले सच को स्वीकारा है वह उनके जैसे महात्मा के लिये ही संभव था । गांधी ने स्वीकारा कि वे पत्नी पर निगरानी रखते थे । नैतिक और धार्मिक शिक्षाओं के कारण वे मानते थे कि व्यक्ति को एकपत्नी-व्रत का पालन करना चाहिये , ..... फिर तो पत्नी को भी एकपति-व्रत का पालन करना चाहिये । यदि ऐसा है तो , मैंने सोचा कि मुझे पत्नी पर निगरानी रखना चाहिये । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधीजी ने निडरता की बात कहीं हैं किन्तु वे डरपोक बहुत थे । वे कहते हैं - ‘‘ मैं चोर , भूत और सांप से डरता था । रात कभी अकेले जाने की हिम्मत नहीं होती थी । दिया यानी प्रकाश के बिना सोना लगभग असंभव था । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सत्य, अहिंसा और शकाहार के समर्थक बापू ने कई बार मांसाहार किया था । ‘‘ ..... मित्रों द्वारा डाक बंगले में इंतजाम होता था । .... वहां मेज-कुर्सी वगैरह के प्रलोभन भी था । .... धीरे धीरे डबल रोटी से नफरत कम हुई ,बकरे के प्रति दया भाव छूटा और मांस वाले पदार्थो में स्वाद आने लगा । ...... एक साल में पांच-छः बार मांस खाने को मिला । ... जिस दिन मांस खा कर आता ... माताजी भोजन के लिये बुलातीं तो उन्हें झूठ कहना पड़ता कि ‘भूख नहीं है , खाना हजम नहीं हुआ है ’ ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्हें बीड़ी पीने का शौक भी लगा और इसके लिये उन्होंने चोरी भी की । वे कहते हैं - ‘‘ एक रिश्तेदार के साथ मुझे बीड़ी पीने का शौक लग गया । गांठ में पैसे नहीं थे इसलिये काकाजी पीने के बाद जो ठूंठ वे फेंक देते थे , उन्हें हमने बीनना शुरु कर दिया । लेकिन ठूंठ हर समय नहीं मिल पाते थे इसलिये अपने यहां के नौकर की जेब से एकाध पैसा चुराने की आदत पड़ गई और बीड़ी खरीदने लगे ’’। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div closure_uid_14g8f9="107"&gt;एक बार उन पर पच्चीस रुपए का कर्ज हो गया । उन्होंने लिखा कि - ‘‘ हम दोनों भाई कर्ज अदायगी के बारे में सोच रहे थे यानी चिंतित थे । भाई के हाथ में सोने का कड़ा था । उसमें से एक तोला सोना काट लेना मुश्किल नहीं था । कड़ा कटा । कर्ज अदा हुआ । इसके बाद ग्लानी से भरे ‘मोहन’ ने पिता को पत्र लिख कर अपनी गलती स्वीकारी । &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोहनदास जब सोलह साल के थे तब की घटना स्तब्ध करने वाली है । ’’ ..... पत्नी गर्भवती हुई । ...... पिताजी लंबे समय से बीमार चले आ रहे थे ..... उनकी बीमारी बढ़ती जा रही थी । ... अवसान की घोर रात्रि समीप आ गई । रात साढ़े दस- ग्यारह बजे होंगे । मैं उनके पैर दबा रहा था , चाचाजी ने कहा ‘जा, अब मैं देखूंगा’ । .... मैं खुश हुआ और सीधा शयन कक्ष में पहुंचा । पत्नी बेचारी गहरी नींद में थी । पर मैं सोने कैसे देता ! .... मैंने उसे जगाया ..... पांच मिनिट बीते होंगे ....... पता चला कि पिता गुजर गए ! ..... ’’ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विलायत में गांधी ने नाचना-गाना भी सीखा । ‘‘ विलायत में ..... सभ्य पुरुष को नाचना जानना चाहिये । ....... मैंने नृत्य सीखने का निश्चय किया । .... एक कक्षा में भर्ती हुआ , एक सत्र की फीस करीब तीन पाउण्ड जमा किये । उस समय यह रकम बड़ी थी । कोई तीन सप्ताह में छः सबक सीखे । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पियानो बजाता था पर कुछ समझ में नहीं आता था । .... सोचा वायलियन बजाना सीख लूं ...... तीन पाउण्ड में वायलियन खरीदा और सीखने की फीस दी ’’ । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विलायत में आहार को लेकर वे उदार रहे ,खासकर अंडों के लिये , लिखते हैं - ‘‘ ... स्टार्च वाला खाना छोड़ा , कभी डबल रोटी और फल पर ही रहा और कभी पनीर , दूध और अंडों का सेवन किया । ..... अंडे खाने में किसी जीवित प्राणी को दुख नहीं पहुंचता है । इस दलील के भुलावे में आ कर मैंने माताजी के सामने की हुई प्रतिज्ञा के रहते भी अंडे खाए । पर मेरा यह ;अंडा मोह थोड़े समय ही रहा । ’’&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ब्रम्हचर्य पालन को लेकर गांधी के विचार खूब जाने जाते हैं , किन्तु इसे साधने में उन्हें बहुत कठिनाई हुई , - ‘‘ संयम पालन ब्रम्हचर्य की कठिनाइयों का पार नहीं था । हमने अलग अलग खाटें रखीं । रात में पूरी तरह थकने के बाद ही सोने का प्रयत्न किया । किन्तु इस सारे प्रयत्न का विशेष परिणाम मैं तुरंत नहीं देख सका । ’’ &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधीजी ने कभी गाली भी खाई होगी यह विश्वसनीय नहीं लगता है । कम से कम भारत में तो ऐसा नहीं हो सकता है , लेकिन हुआ । सन् 1891 के आपपास के समय वे काशी आए थे -- ‘‘ मैं काशी-विश्वनाथ के दर्शन करने गया । वहां जो देखा उससे मुझे बड़ा दुख हुआ । संकरी , फिसलन भरी गली से हो कर जाना था । शांति का नाम भी नहीं था । मक्खियों की भिनभिनाहट और दुकानदारों का कोलाहल असह्य था । ....... वहां मैंने ठग दुकानदारों का बाजार देखा । ..... मंदिर में पहुंचने पर सामने बदबूदार सड़े हुए फूल मिले । .... अंदर भी गंदगी थी । .... मैं ज्ञानवापी में गया , वहां भी गंदगी थी । दक्षिणा के रुप में कुछ भी चढ़ाने की मेरी श्रद्धा नहीं थी इसलिये मैंने सचमुच ही एक पाई चढ़ाई जिससे पुजारी तमतमा उठे । उन्होंने पाई फैंक दी । दो-चार गालियां दे कर बोले -‘ तू यों अपमान करेगा तो नरक में पड़ेगा ’ । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये गांधी के सच की कुछ बानगियां थीं । हमारी नई पीढ़ी को इनसे उनके सोच और जीवन के अनछुए पक्षों का पता चलता है । उन्होंने यह सच उस समय कहा जब वे महात्मा हो गए थे । गांधी का यह सच जान कर भी हमारे मन में उनके प्रति आस्था कम नहीं होती है अपितु बढ़ती है । &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-7893617074900399799?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/7893617074900399799/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=7893617074900399799' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/7893617074900399799'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/7893617074900399799'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2011/08/blog-post_1196.html' title='हमारे महात्मा ऐसे भी थे'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' 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थोड़ा ज्यादा महंगा है। इसकी कीमत 2000 है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दुकानदार ने जब तीसरे तोते की कोई खासियत नहीं बताई तो व्यक्ति ने कहा यह तोता इतना महंगा क्यों है जबकी इसकी तो कोई खासियत भी नहीं है। इस पर दुकानदार बोला साहब पता नहीं यह तोता कुछ नहीं करता फिर भी यह दोनों तोते इसे बॉस कहते हैं। बस इसी लिए इसकी कीमत ज्यादा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-5388435544011813215?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/5388435544011813215/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=5388435544011813215' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' 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trbidi="on"&gt;अन्ना हजारे के साथ जनता के होने के कई मायने हो सकते हैं लेकिन राजनेताओं के होने का केवल एक ही मतलब है, वह है कांग्रेस को धकियाकर सत्ता पर काबिज होना। &lt;br /&gt;भ्रष्टाचार की खिलाफत तो एक जरिया मात्र है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अन्ना व जनता को सतर्क रहकर इस आंदोलन को बरकरार रखना होगा। जनता को खुद के प्रति ईमानदार रहते हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठानी होगी। घूस बेना व देना बंद करना होगा, भले ही इसके लिए तकलीफ उठानी पड़े। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-7393186490211472550?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/7393186490211472550/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' 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है। सोनिया-सुषमा में बेहतर संवाद होता है। दोनों नेताओं के बीच महिला आरक्षण विधेयक को पारित करवाने के लिए इशारों में हुई सदन में बातचीत बेहतर होते संबंधों की एक बानगी थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीते एक साल में तमाम उतार-चढ़ाव भरे पलों में सोनिया गांधी ने साबित किया है कि उनके हाथ में फैसलों की चाभी तो है ही उसका बेहतर और निर्णायक इस्तेमाल उन्हें बखूबी आता है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने नई यूपीए दो सरकार के शपथ ग्रहण समारोह में ममता और शरद पवार की पार्टी को भी अपना ही मानते हुए चुनिंदा विश्वस्त लोगों से रू-ब-रू होते हुए कहा था कि दिस इज रियल कांग्रेस। तब द्रमुक सरकार में शामिल नहीं हुई थी। साल भर में तृणमूल की ममता और राकांपा से कई मौकों पर तकरार की नौबत आने के बावजूद शायद यह कांग्रेस अध्यक्ष के अपनेपन का भरोसा ही था कि कोई भी दल विश्वास तोड़ने की हद तक नहीं डिगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सही मायने में यूपीए दो सरकार का पहिया कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के आभामंडल के इर्द-गिर्द ही घूमता नजर आ रहा है। बीते एक साल में महिला आरक्षण विधेयक से लेकर खाद्य सुरक्षा कानून की दिशा में आगे बढ़ने का अहम कामकाज सरकार से ज्यादा कांग्रेस अध्यक्ष का एजंेडा नजर आया है। कांग्रेस अध्यक्ष इन दिनों राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की मुखिया के तौर पर सरकार को सलाह देने की नई भूमिका की तैयारियों मंे जुटी हैं तो उनके एजेंडे में वे सभी कार्यक्रम होंगे जो कांग्रेस के घोषणापत्र में शामिल हैं। कांग्रेसी नेताओं का कहना है कि कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने विश्वस्त रणनीतिकारों की टीम के साथ सियासत का हरेक दांव बखूबी जीतकर साबित किया कि वे भारतीय राजनीति की अहम शख्सियत होने के साथ ही सत्ता की सबसे ताकतवर किरदार हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पार्टी नेता मानते हैं कि महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में पारित करवाने का ऐतिहासिक मौका अगर सरकार की उपलब्धियों की कड़ी में जुड़ा तो उसका श्रेय कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को ही जाता है। उन्होंने अपने दृढ़ फैसले से विरोधी दलों की रणनीति को भी चारों खाने चित कर दिया। पार्टी नेताओं का मानना है कि कांग्रेस अध्यक्ष के कुशल नेतृत्व का उदाहरण सिर्फ इतना भर ही नहीं है। जिन राजनीतिक दलों ने महिला आरक्षण विधेयक पर सरकार को पटखनी देने की कसमें खाई थीं, वही कटौती प्रस्ताव के दौरान सरकार का तारणहार बनकर सामने आ गए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने विश्वस्त मंडली को आगे करके हर मुकाम को सफल रणनीति के साथ न सिर्फ जीता बल्कि पार्टी की ताकत लगातार बढ़ती नजर आई। कांग्रेस सूत्रों का कहना है कि पार्टी जब चुनाव जीती थी तो तमाम राजनीतिक समीक्षकों को लग रहा था कि अब कांग्रेस में युवा महासचिव राहुल गांधी की ज्यादा चलेगी। जीत का सेहरा भी कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी, प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ राहुल के सिर बंधा था। लेकिन एक साल की सियासी कहानी से साफ है कि राहुल की ताकत में संगठनात्मक स्तर पर लगातार इजाफा होने के बावजूद अहम फैसलों की चाबी कांग्रेस अध्यक्ष के हाथ ही रही है। इस दौरान राहुल सत्ता की अलग धुरी बनने के बजाए पार्टी के लिए वैल्यू एडीसन का काम करते रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;बाजीमात करने में माहिर :&lt;/strong&gt; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;16 मई 2009 को जब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस को 206 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी के रूप में देश की सत्ता संभालने का जनादेश हासिल हुआ तो पूरा कांग्रेसी कुनबा आत्मविश्वास से लबरेज था। कांग्रेस में हर तरफ एकला चलो की गूंज नजर आ रही थी। कांग्रेसी रणनीतिकारों का दावा था कि नतीजे इस बात के गवाह हैं कि अब देश में दो ध्रुवीय राजनीति का दौर भी खत्म होने वाला है। कांग्रेस के नेता दावा कर रहे थे कि एक ओर कांग्रेस है तो दूसरी तरफ देश के सभी राजनीतिक दलों को मिलाकर दूसरा कुनबा। लेकिन बीते एक साल में देश की सियासत के साथ कांग्रेस की पारी भी उतार चढ़ाव से भरी रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बजट सत्र के बाद कांग्रेस को भले ही मुस्कराने का मौका मिला है लेकिन इस दौरान पार्टी को पूरी तरह आटे-दाल का भाव भी पता चला। आजादी के बाद पहली बार ऐसा मौका आया जब देश की सरकार को कटौती प्रस्ताव पर मतदान का सामना करना पड़ा। कांग्रेस इस जंग में विरोधी एकता को तोड़कर जीती तो जरूर लेकिन उसे राजद, सपा जैसे अपने पुराने साथियों के साथ यूपी की सियासत में अपनी सबसे बड़ी प्रतिद्वंद्वी मायावती को भी थैंक्स बोलने पर मजबूर होना पड़ा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के रूप में संगठन में सबसे ताकतवर एक केंद्र होने के बावजूद पार्टी को अपनों ने ही कई मौकों पर पानी पिलाया। शशि थरूर और जयराम रमेश जैसे चेहरे के रूप में दो ताजा उदाहरण सामने हैं। सहयोगी दलों में ए राजा का विवाद हो, ममता की तुनुकमिजाजी हो या फिर इन सबसे इतर राकांपा प्रमुख शरद पवार की चतुर राजनीतिक चाल सबने कांग्रेस को आए दिन मुश्किलों से दो-चार किया। हालांकि अलग-अलग राजनीतिक दलों की बैसाखी के सहारे कांग्रेस हर चुनौती से बाहर निकलने में कामयाब रही तो इस ब्यूह रचना में सबसे अहम किरदार कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ही साबित हुईं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;विरोधी चारो खाने चित्त&lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कांग्रेसी रणनीतिकार मानते हैं कि सरकार के लिए मुसीबत बन रहा विरोधी कुनबा फाइनल में हर बार बुरी तरह पिटा। सोनिया गांधी ने जाति आधारित जनगणना पर लालू और मुलायम को हां बोलकर इस मसले पर अलग-अलग राह पर खड़ी नजर आ रही पूरी सरकार को हामी की मुद्रा में ला दिया। अब सरकार रास्ते तलाश रही है कि किस तरह से जाति आधारित जनगणना के कांग्रेस अध्यक्ष के वादे को पूरा किया जाए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-3873424925996778976?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/3873424925996778976/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=3873424925996778976' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/3873424925996778976'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/3873424925996778976'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2010/05/blog-post.html' title='सोनिया गांधी ने गांधीगिरी से साधी सत्ता'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-3715552592285549320</id><published>2009-11-12T04:42:00.001-08:00</published><updated>2009-11-12T04:43:42.881-08:00</updated><title type='text'>इंदिरा गाँधी का एक रूप यह भी (जन्मदिन पर विशेष)</title><content type='html'>&lt;strong&gt;जेपी की “मॉरल अथारिटी” और इंदिरा गाँधी को “स्टेट पॉवर” की देश को ज़रूरत: चंद्रशेखर (पूर्व प्रधानमंत्री) &lt;/strong&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जो रुख इंदिरा गाँधी ने अपनाया था, वैसे में उनके पास कोई और रास्ता नहीं बचा था. ऐसा भी नहीं था कि सारी परिस्थितियाँ अचानक प्रगट हो गईं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अगर इंदिरा जी को प्रधानमंत्री बने रहना था तो आपातकाल के अलावा और कोई दूसरा रास्ता नहीं था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंद्रकुमार गुजराल हमारे पुराने मित्रों में से हैं. गुजराल इंदिरा गाँधी के सलाहकारों में से एक थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन गुजराल हमारे पास आए. उन्होंने कहा कि आपका और इंदिरा जी का समझौता हो जाना चाहिए. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने कहा कि समझौते की कोई बात ही नहीं है. हम लोग दो रास्तों पर चल रहे हैं. इंदिरा गाँधी के लिए ऐसा करना मज़बूरी ही थी. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हमने गुजराल से कहा कि थोड़े दिन बाद यह ख़बर पढ़ोगे कि मैं ट्रक से दबकर मर गया या जेल चला गया.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुजराल कहने लगे कि आप ऐसा क्यों सोचते हैं? इंदिरा गाँधी को जवाहरलाल नेहरू ने ट्रेनिंग दी है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने उनसे कहा कि मैं जवाहरलाल नेहरू को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता. उनसे मेरा कोई परिचय भी नहीं था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने तो अपनी विवशता जाहिर कर दी. मैंने गुजराल से कह दिया कि “न तो मैं बदलने वाला हूँ, न ही वो.” इस मुलाकात के 15 दिनों के भीतर इमरजेंसी लग गई.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सलाह मशविरा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने चुनावों को लेकर कोई सलाह तो दी नहीं थी. हाँ, एक ही दिन मैंने जयप्रकाश नारायण और इंदिरा गाँधी को ख़त लिखा था. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इंदिरा गाँधी को अंग्रेजी में और जयप्रकाश नारायण को हिंदी में पत्र लिखा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने जेपी को लिखा कि “जो लोग आपके साथ आ रहे हैं, उनका संपूर्ण क्राँति से कोई लेना देना नहीं है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये लोग आपके साथ सिर्फ़ इसलिए हैं ताकि इनको “पॉवर पॉलिटिक्स” में हिस्सेदारी मिल सके और ये नौज़वान नेता आने वाले दिनों में जातियों के नेता हो जाएंगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अंतिम लक्ष्य तक पहुँचने के लिए ये लोग आपको भी भूल जाएंगे. इंदिरा गाँधी को लिखा कि कम्युनिस्ट आपको आगे बढ़ा रहे हैं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपके और जेपी के बीच झगड़ा होगा तो देश का भारी नुक़सान होगा. आदर्शों और सिद्धांतों पर आपका उनसे मतभेद नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने एक सार्वजनिक बयान दिया कि देश को आज जेपी की “मॉरल ऑथिरिटी” और इंदिरा गाँधी को “स्टेट पॉवर” की ज़रूरत है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दोनों को मिलाकर देश का भला हो सकता है. अन्यथा देश पर खतरों के बादल मंडरा रहे हैं. किसी ने मेरी बातों को गंभीरता से नहीं लिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक समय लग रहा था कि जेपी और इंदिरा गाँधी में समझौता हो जाएगा. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब समझौता करीब-करीब फाइनल स्टेज में पहुँच गया तो हमारे मित्र रामनाथ गोयनका और गंगा बाबू ने उसमें अड़ंगा लगा दिया. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;व्यक्तित्व&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;राजनीति के शिखर पर आज जो चेहरे दिख रहे हैं, उनसे वे हज़ार गुना अच्छी थीं. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन सत्ता उनकी सबसे बड़ी कमज़ोरी थी. पॉवर अपने हाथ में रखना चाहती थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी कारण न तो वह देश का भला कर सकीं और न ही अपना. उनकी सोच थी कि पॉवर परिवार को ही मिलनी चाहिए. बेटे को ही मिलनी चाहिए.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिन लोगों ने उन्हें प्रधानमंत्री बनाया था, उनकी सोच यह थी कि यह महिला कुछ नहीं कर पाएगी. और वे लोग सत्ता को अपने मन-मुताबिक चला सकेंगे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन हुआ इसके उलट. हाथ में पॉवर आने के बाद वह अपने ढंग से सत्ता चलाने लगीं. लेकिन उनकी इच्छाशक्ति बहुत दृढ़ थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;('चंद्रशेखर-रहबरी के सवाल' से साभार)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-3715552592285549320?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/3715552592285549320/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=3715552592285549320' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/3715552592285549320'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/3715552592285549320'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/11/blog-post.html' title='इंदिरा गाँधी का एक रूप यह भी (जन्मदिन पर विशेष)'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-4148260652765524981</id><published>2009-10-01T04:08:00.000-07:00</published><updated>2009-10-01T04:08:08.402-07:00</updated><title type='text'>फूलन देवी : The Bandit Queen---पार्ट-3</title><content type='html'>जब लालाराम ठाकुर डाकू जेल से छूट कर आता है, तो विक्रम मल्लाह उसे पूरा सम्मान देता है। रायफल देता है। लेकिन लालाराम के मुँह से पहला वाक़्य जो निकलता है और जिस लहज़े में निकलता है, उससे जात-पात की बू आती है। उसकी बात मल्लाह डाकुओं को अच्छी नहीं लगती है, लेकिन सह लेते हैं। लालाराम को एक मल्लाह के हाथ नीचे डाकू बने रहना स्वीकार न था। वह ज़ल्दी ही मल्लाह को धोखे से मारकर कायरता का परिचय देता है। फूलन के साथी सभी ठाकुर डाकू सामूहिक बलात्कार कर अपनी वीरता का झण्डा ऊँचा करते हैं ! लेकिन इससे भी ठाकुर के पत्थर कलेजे को ठंडक नहीं पहुँचती है, तब लालाराम बेहमई गाँव में फूलन को पूरे गाँव की मौजूदगी में नग्न कर देता है और उसे पानी भरने को कहता है। उसके बाल पकड़कर एक एक को दिखाता है कि ये मल्लाह ख़ुद को देवी कहकर बुलाती है। मुझे इसने मादरचोद कहा था। गाँव के सारे ठाकुर फूलन को नग्न देखते हैं। कोई विरोध नहीं करता एक औरत को इस हद तक ज़लील करने की। उस वक़्त हवा को भी जैसे लकवा मार जाता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फूलन इस सबके बाद जी जाती है, जितना फूलन ने सहा किसी खाते-पीते घर की औरत को यह सहना पड़ता। या किसी भी दबंग को यह सहना पड़ता, तो शायद सत्ता में, गाँव में, और हर जगह अपनी मूँछ पर बल देकर घुमने वाले दबंग की पेशानी भीग जाती। लेकिन फूलन के साथ अनेकों बार हुए बलात्कारों, ज़्यादतियों को सत्ता ने कोई तरजीह नहीं दी। आज भी आये दिन दलितों, आदिवासियों और ग़रीब स्त्रियों के साथ बलात्कार और ज़्यादतियों की ख़बरे कम नहीं सुनने-पढ़ने में आती है। लेकिन किसी के कान पर जूँ नहीं रेंगती है। अभी कुछ दिन पहले की ही बात है। धार ज़िले के गाँव में कमज़ोर वर्ग की दो औरतों को निर्वस्त्र कर गाँव भर में घुमाया गया था। उन्हें भी वैसे ही देखा गया जैसे बेहमई गाँव में फूलन को देखा गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहने का मतलब यह है कि आज भी स्त्रियों पर अत्याचार कम नहीं हो रहे हैं, बल्कि बढ़ते ही जा रहे हैं। जबकि स्त्रियों के मुद्दों पर काम करने के नाम पर, उन्हें चेतना संपन्न बनाने और उनके अधिकारों को बहाल कराने के नाम पर हज़ारों एन.जी. ओ. खुले हैं। लेकिन इस सब के जो नतीजे हैं, उससे वे कोई भी अंजान नहीं हैं, जिनके ज़िम्मे ज़िम्मेदारियाँ हैं, बस.. खामौश है। वह खामौशी शायद मुँह में भ्रष्टाचार की मलाई होने की वजह से है ! या फिर स्त्रियों की एक बड़ी जमात का फूलन के अनुसरण करने की है। भविष्य के खिसे में क्या है कभी तो राज़ खुलेगा !&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;14 फरवरी 1981 वह दिन था, जब फूलन, मानसिंह और साथी डाकुओं ने बेहमई गाँव के 24 ठाकुरों को मौत के घाट उतार दिया था। इस घटना ने राज्य और केन्द्र की सरकार की चिंता बढ़ा दी। क्योंकि म.प्र. और केन्द्र की सरकार में ठाकुर लाबी हावी थी। केन्द्र में देश की जनता को एमरजेंसी का स्वाद चखाने वाली प्रधानमंत्री थी। शायद उन्हीं दिनों प्रधानमंत्री पंजाब की राजनीति को नया रंग देने में व्यस्त थी, जिसका परिणाम देश ने बाद में देखा और फिर भोगा भी। लेकिन वही समय था, जब फूलन का ग़ुस्सा चंबल के किनारे तोड़ खौफ़ का पर्याय बन गया था। गाँव की सत्ता हो, देश की सत्ता हो या फिर सरकारी महकमा दबंग जहाँ कहीं था, विद्रोही फूलन के नाम से उसकी सांस ऊपर-नीचे हो रही थी। राज्य और केन्द्र की सरकार पर ठाकुर मंत्रियों का दबाव बढ़ रहा था। इसी के चलते सरकार ने फूलन के गिरोह को नष्ट करने का आदेश दिया। फिर पुलिस जितनी अमानवीय तरीक़े से फूलन के साथ पेश आ सकती थी, आयी। ठाकुर डाकू लालाराम और पुलिस ने या कहो लो सरकार ने मिलकर बागी फूलन की गेंग के ख़िलाफ़ अभियान शुरू किया। पहली बार में फूलन के गिरोह के दस बागियों को ढेर कर दिया। जंगल में पीने के पानी स्त्रोतों में ज़हर मिला दिया। फूलन को 12 फरवरी 1983 को आत्मसमर्पण करना पड़ा। इस तरह फूलन के बागी जीवन का अंत हुआ। एक फूलन का बाग़ी जीवन ख़त्म हुआ। लेकिन जिस आर्थिक, सामाजिक ग़ैरबराबरी की खाई ने फूलन को बाग़ी बनाया वह संकरी न हुई, बल्कि चौड़ी होती जा रही है, जिससे बाग़ी नये-नये रूप में दिखाई दे रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(बिजूका से साभार)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-4148260652765524981?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/4148260652765524981/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=4148260652765524981' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/4148260652765524981'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/4148260652765524981'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/10/bandit-queen-3.html' title='फूलन देवी : The Bandit Queen---पार्ट-3'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-2364854012568510776</id><published>2009-10-01T04:05:00.000-07:00</published><updated>2009-10-01T04:05:18.872-07:00</updated><title type='text'>फूलन देवी : The Bandit Queen---पार्ट-2</title><content type='html'>फूलन मायके में ही जवान होती है। उसकी जवानी पर गाँव के सरपंच के आवारा मोड़े और उसके साथी मोड़ों की नज़र होती है। वे उसे आते-जाते छेड़ते हैं और एक दिन खेत में अकेली को घेरकर ज़बरदस्ती करने की कोशिश करते हैं। ज़बरदस्ती तो नहीं कर पाते, लेकिन सब मिलकर उसे बुरी तरह से पीटते हैं। गाँव में पंचायत बैठती है और फूलन पर बदचलनी का एक तरफ़ा आरोप लगा उसे गाँव बाहर कर देती है। बार-बार प्रताड़ित, बार-बार बलात्कार फूलन के विद्रोही स्वभाव को कुचल नहीं पाता, बल्कि और भड़काता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब वह बंदूक थाम लेती है। पुत्तीलाल से बदला लेने पहुँचती है। पुत्तीलाल को गधे पर बैठाया जाता है। फिर लकड़ी के खम्बे से बाँध कर मारती-पीटती है। लेकिन जब वह यह कर रही होती है, उसके कान में ख़ुद की ही चीत्कार गूँजती है। वह चीत्कार जो कभी पुत्तीलाल द्वारा ज़बरदस्ती करने का विरोध करते हुए ससुराल में गूँजी थी। ग्यारह बरस की एक बहू जब मदद के लिए चीत्कार रही थी। सास दरवाजा भीड़कर दूसरी तरफ़ चली गयी थी। बदला लेते वक़्त उसे वह सब याद आ रहा था। उसकी छटपटाहट, उसे ग़ुस्से का पारावार किसी की भी मग़ज़ सुन्न कर देने वाला होता है। यहाँ फूलन अपने साथी विक्रम मल्लाह से कहती है- एस पी को चीट्ठी लिख…, अगर कोई छोटी मोड़ी को ब्याहेगा तो जान ले लूँगी।&lt;br /&gt;जब फूलन को यह सब भोगना पड़ रहा था, तब केन्द्र और म.प्र. में काँग्रेस की सरकार थी। वही काँग्रेस, जो आज़ादी के बाद से ख़ुद को दबे-कुचलों के हित का ध्यान रखने वाली पार्टी होने का ढींढ़ोरा पीटती रही है। वही काँग्रेस जिसका इतिहास आज़ादी के आँदोलन में महत्तपूर्ण भूमिका निभाने वाला रहा है। उस पर धीरे-धीरे दबंगों और ठाकुरों ने किस तरह से कब्जा कर लिया। उस काँग्रेस का जैसे अर्थ ही बदल गया। जब फूलन अपने मान-सम्मान का बदला लेने और ख़ुद को ज़िन्दा बचाये रखने की लड़ाई लड़ रही थी, तब प्रदेश और देश की राजनीति में और सरकारों में भी ठाकुरों का ही बोलबाला था। इन ठाकुर नेताओं के संरक्षण में या आड़ में कह लो, इनके रिश्तेदार, और ख़ुद इन्हीं के द्वारा ग़रीब और मज़दूर वर्ग के लोगों पर किये जाने वाले शोषण और अत्याचार की कोई सीमा नहीं थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जंगल में भी जो ठाकुर डाकू थे, उनका दूसरे डाकू गिरोहों पर दबदबा था। जो उनके दबदबे को स्वीकार नहीं करता था, उसे या तो ख़ुद डाकू ही मार देते या पुलिस से मरवा देते। सरकार, पुलिस और डाकू सभी में ठकुराइ के प्रति बड़ी वफ़ादारी थी। डाकू बाबू गुर्जर को तो विक्रम मल्लाह उस वक़्त मार देता है, जब वह बीहड़ में फूलन के साथ ज़बरदस्ती कर रहा होता है। उसके कुछ वफ़ादारों को भी मार देता है और गेंग का लीडर बन जाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-2364854012568510776?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/2364854012568510776/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=2364854012568510776' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/2364854012568510776'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/2364854012568510776'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/10/bandit-queen-2.html' title='फूलन देवी : The Bandit Queen---पार्ट-2'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-5804958435048829224</id><published>2009-09-17T02:27:00.001-07:00</published><updated>2009-09-17T02:27:41.567-07:00</updated><title type='text'>फूलन देवी : The Bandit Queen---पार्ट-1</title><content type='html'>"मैं फूलन देवी हूँ भेनचोद.. मैं हूँ।"&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बेंडिट क्वीन फ़िल्म का यह पहला संवाद है, जो दर्शक के कपाल पर भाटे की नुकीली कत्तल की माफिक टकराता है। अगर दर्शक किसी भी तरह के आलस्य के साथ फ़िल्म देखने बैठा है, या बैठा तो स्क्रीन के सामने है और मग़ज़ में और ही कुछ गुन्ताड़े भँवरे की तरह गुन गुन कर रहे हैं, तो सब एक ही झटके में दूर छिटक जाते हैं। दर्शक पूरी तरह से स्क्रीन पर आँखें जमाकर और मग़ज़ के भीतर के भँवरे पर काबू पाकर केवल फ़िल्म देखता है और फ़िल्म यहीं से फ्लैश बैक में चली जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्क्रीन पर नमुदार होते हैं, चप्पू के हत्थे को थामें मल्लहा के हाथ, और फिर पूरी नाव। नाव चंबल की सतह पर धीरे से आगे खिसकती है, अपनी गोदी में आदमी, औरत, बच्चे, पोटली, ऊँट और भी बहुत कुछ मन के भीतर का, जो नाव में सवार चेहरों पर दिखता है। शायद काम की तलाश, शायद गाँव को छोड़ने का दुख और भी कुछ। दर्शक इन्हीं चेहरों में खोजता है ख़ुद को और कुछ सोचने की तरफ़ बढ़ता है कि भूरे, मटमेले, ऊँचे बीहड़ों में से निकलता है बकरियों का एक झुण्ड। नदी किनारे आते झुण्ड के पीछे चल रहे हैं एक दाना (बुजुर्ग) और किशोर। यह पूरा दृश्य दर्शक के मन में रोज़गार के अभाव और विस्थापन की त्रसदी की चित्रात्मक कहानी बुनता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिर आता है एक बच्ची की हाँक में एक बच्ची को बुलावा- फूलन … ए फूलन…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वह 1968 की एक दोपहर थी, जिसमें फूलन को पुकार रही थी एक बच्ची, जो शायद उसी की बहन थी। लेकिन ग्यारह बरस की फूलन अपनी सखियों के साथ नदी में किनारे पर डुबुक-डुबुक डूबकियाँ लगा रही थीं। वे केवल नहा नहीं रही थी, बल्कि सब सखियाँ मिलकर नदी में एकदूसरी के साथ और नदी के पानी के साथ खेल रही थीं। एकदम निश्चिंत और उन्मुक्त। शायद ये बेदधड़कपन और उन्मुक्तता चंबल के पानी में घुला कोई तत्व था, जो फूलन के भीतर कुछ ज़्यादा ही मात्रा में घुल गया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बार हाँक थोड़ी नज़दीक से और कुछ ज़ोर से आयी- फूलन…. ए फूलन…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फूलन ने देखा अपनी बहन के साथ और वहीं से पूछा- कईं है………..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो के बुला रये ..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;काई …?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मोके ना मालुम…&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नदी से बाहर आती फूलन सरसों की एक कच्ची फली की तरह नन्हीं लगती है, लेकिन सवालों से भरी आँखें बोलती लगती है। फूलन के नदी से बाहर आने और घर पहुँचने के बीच, फ़िल्म में यह स्थापित किया जा चुका होता है कि फूलन को उसका पति पुत्तीलाल लेने आया है। पुत्तीलाल की उम्र क़रीब 27-28 बरस है। फूलन की माँ अनुरोध करती है कि अभी मोड़ी ग्यारह बरस की ही है। कुछ महीने बाद गौना कर देंगे। लेकिन पुत्तीलाल नहीं मानता है। अपनी माँ के बूढ़ी होने की वजह से काम न कर पाने का हवाला देता है। कहता है कि उसे मोड़ियों की कमी नहीं है। यही नहीं, बल्कि रिश्ता तोड़ने की भी धमकी देता है। फूलन का पिता भी समझाता है, लेकिन जब पुत्तीलाल नहीं मानता और किसी कर्ज़ माँगने वाले की तरह बात करता है। उसे दी गयी गाय को खूँटे से छोड़ लेता है। तब फूलन के पिता कहते हैं – ले जाने दे, अपन को कौन मोड़ी को घर में रखना है। और कोई ऊँच-नीच हो गयी तो … आदि..आदि चिंताएँ व्यक्त करता है। अंततः ग्यारा बरस की फूलन को 27-28 बरस के पुत्तीलाल के साथ रवाना कर दी जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फूलन का माँ-बाप से अलग होना और पुत्तीलाल के साथ जाने का दृश्य बहुत ही मार्मिक है। जैसे कोई गाय का दूध धाहती बछड़ी को स्तनों से अलग खींचता है और वह दौड़कर फिर स्तन को मुँह में ले लेती है। लेकिन जब बछड़ी स्तन को मुँह में लेने जाये और गाय भी उसे लात या भिट मारने को विवश हो जाये, तब दोनों ही पर क्या गुज़रती होगी, जबकि उस वक़्त उसे स्नेह के दूध की बेहद ज़रुरत होती है। दर्शक के मन में यही दृश्य उभरता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब ससुराल पहुँचती है। फूलन गाँव के बीच के कुए पर गारे का हण्डा लेकर पानी भरने जाती है। अभी भी कई गाँव में दबंगों और नीची समझी जाने वाली जाती के लोगों के पानी के कुए अलग-अलग होते हैं। लेकिन फूलन की ससुराल में 1968 में भी ठाकुर और मल्लाह का एक ही कुए से पानी भरना बताया है। एक कुए से पानी भरते हैं, लेकिन एक दूसरे के बर्तनों को आपस में छूने से बचाते हैं। पानी खींचने की रस्सी, बल्टी भी अलग रखते हैं। लेकिन जब ग्यारह बरस की बहू को पता नहीं होता है, और अनजाने में या भूल से वह ठाकुर वाली बाल्टी को छूने लगती है, तो कुए से पानी भरने वाली ठकुराइने वहीं उसे घुड़क देती है और वह दूसरे छोर से, दूसरी रस्सी,बाल्टी लेकर कुए से पानी खींचती है। पानी लेकर चलती है, तो उसका हम उम्र मोड़ा और मोड़ों के साथ मिलकर उसका हण्डा फोड़ देता है। फूलन हण्डा फोड़ने वालों पर ज़ोर से चिल्लाती है, उसका चिल्लाना ठकुराइनों के कान खड़े कर देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब बग़ैर पानी लिए घर पहुँचती है, तो सास हण्डा फूटने की बात को लेकर डाँटती है। फूलन का सास के सामने भी वही तेवर बरकरार होता है। वह सास को ताना मारती है- गारे का हण्डा टूट गया, तो पीतल का लाओ, जैसे ठकुराइनों के पास है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सास को यह ताना गचता है। गचना स्वाभाविक भी है, क्योंकि उसकी आर्थिक स्थिति ठाकुरों की बराबरी करने की नहीं होती है। सास कहती है- बहुत जबान चलती है, बुलाऊँ पुत्तीलाल को..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुत्तीलाल फूलन को इस बात पर मारता है। वही पुत्तीलाल रात में ग्यारह बरस की फूलन के साथ बलात्कार करता है। पुत्तीलाल के इस कृत्य ने फूलन के जीवन में किसी भी तरह के सुख की संभावना को जैसे पोंछ दिया था। उस घटना से फूलन के मन में पुरुष के प्रति जो घृण का रिसाव हुआ, वह पूरी फ़िल्म में कई जगह प्रकट होता है। फूलन भागकर माइके आ जाती है। पुत्तीलाल से रिश्ता ख़त्म हो जाता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-5804958435048829224?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/5804958435048829224/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=5804958435048829224' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/5804958435048829224'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/5804958435048829224'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/09/bandit-queen-1.html' title='फूलन देवी : The Bandit Queen---पार्ट-1'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-4513540248220744405</id><published>2009-09-14T04:25:00.000-07:00</published><updated>2009-09-14T04:25:40.086-07:00</updated><title type='text'>ओसामा बिन लादेन की हकीकत क्या....3</title><content type='html'>पार्ट-3&lt;br /&gt;तीन नवंबर, 2001 को जारी दूसरे वीडियो टेप में भी बीमार ओसामा ने अमेरिका की आलोचना की थी और मुस्लिमों से कहा था कि वे हमले पर खुशी जताएँ, लेकिन उसने किसी भी अवसर पर यह नहीं माना कि वह हमले में शामिल था। ग्रिफिन का दावा है कि 13 दिसंबर, 2001 को ओसामा की मौत होने के बाद अमेरिकी सरकार ने नया वीडियो जारी किया जिसमें लादेन ने अपने पूर्व बयानों से हटते हुए 11 सितंबर के हमलों की सारी जिम्मेदारी स्वीकारी और यह बताने की कोशिश की कि किस तरह हमला किया गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहा गया कि यह टेप जलालाबाद, अफगानिस्तान में एक घर में अमेरिकी सैनिकों को मिला था, जबकि इसके साथ जुड़ा एक लेबल यह दर्शाता है कि इसे 9 नवंबर, 2001 को बनाया गया था। अमेरिका और ब्रिटेन में कहा गया कि इस वीडियो से साफ है कि अमेरिका पर आतंकवादी हमला उसी ने कराया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रिफिन का कहना है कि स्वीकृति वाला यह वीडियो टेप जितने सवालों के उत्तर नहीं देता है उससे ज्यादा संख्या में सवाल खड़े करता है क्योंकि इस टेप में ओसामा बिल्कुल अलग दिखता है। इसमें वह भारी आदमी दिखता है जिसकी दाढ़ी पूरी तरह से काली है। उसकी पीली त्वचा का रंग भी काला पड़ गया है। उसकी नाक भी बदली हुई है और दुबली पतली अँगुलियों वाले हाथ किसी मुक्केबाज जैसे हाथों में बदल गए हैं। ऐसा लगता है कि उसका स्वास्थ्य बहुत अच्छा हो गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे पहले लादेन को अपने दाहिने हाथ से लिखते देखा गया था, लेकिन वास्तव में वह बाँए हाथ से लिखता था। उनका कहना है कि सिविल इंजीनियरिंग पढ़े ओसामा से इस बात की उम्मीद भी नहीं की जा सकती है कि वह ऐसी बातें कहता, जबकि आतंकवादी बनने से पहले वह बड़ी-बड़ी इमारतें बनाने वाला ठेकेदार था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रिफिन का कहना है कि अल कायदा प्रमुख को पता होना चाहिए कि ट्‍विन टॉवर्स में लोहे का नहीं वरन स्टील का इस्तेमाल किया गया था और पूरी इमारत में लगे स्टील या लोहे को पिघलने के लिए 2800 डिग्री फारेनहाइट की गर्मी चाहिए थी, जबकि विमान के ईंधन, हाइड्रोकार्बन आग, 1800 डिग्री फॉरेनहाइट से अधिक तक नहीं पहुँचती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका कहना है कि इस बात को मानने के लिए बहुत से कारण हैं कि 2001 के बाद के सभी टेप फर्जी हैं क्योंकि ये सभी ऐसे समय पर आए जब बुश प्रशासन को दुनिया की मदद की जरूरत थी। ओसामा की हमले की स्वीकारोक्ति संबंधी टेप भी तब आया जब बुश और ब्लेयर यह सिद्ध नहीं कर सके कि आतंकवादी हमले के लिए ओसामा जिम्मेदार है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रिफिन का दावा है कि पश्चिमी देशों की सरकारों ने अत्याधुनिक स्पेशल इफेक्ट्‍स फिल्म तकनीक से बिन लादेन की इमेज और वोकल रिकॉर्डिंग्स को बदल डाला। अब सबाल उठता है कि अगर ये फर्जी थे तो अल कायदा चुप क्यों रहा? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;असली बिन लादेन का क्या हुआ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वास्तव में उग्रवादी संगठन मिल रहे प्रचार से खुश है क्योंकि इसका समर्थन कम हो रहा था। उसने भी इस मिथ को बढ़ावा दिया कि इसका करिश्माई नेता अभी भी जिंदा है ताकि इसके साथ जुड़ने वालों को प्रोत्सा‍ह‍ित किया जा सके। वास्तव में आतंकवादी हमले के चार माह बाद जनवरी, 2002 को लादेन की बीमारी से मरने के समाचार प्रमुखता में आए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस संबंध में पाकिस्तानी नेताओं, परवेज मुशर्रफ से लेकर जरदारी तक, के बयान ध्यान देने योग्य हैं जिनमें कहा गया है कि ओसामा अब जिंदा नहीं है। डॉक्टरों का भी कहना है कि किडनी की बीमारी से लड़ने के लिए जिस मशीन की जरूरत होती है उसे साथ लेकर पहाड़ी दर्रों में घूमना संभव ही नहीं है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रिफिन की किताब में यह भी लिखा है कि किडनी की बीमारी से जुड़े यूरिनरी इनफेक्शन का इलाज ओसामा ने आतंकवादी हमले से दो माह पहले जुलाई 2001 में दुबई के एक अस्पताल में कराया था। तभी उसने अफगानिस्तान के लिए मोबाइल डायलिसिस मशीन का ऑर्डर दिया था। डायलिसिस कराने के लिए उसे डॉक्टरों के साथ एक निश्चित स्थान पर नियमित तौर पर रहना पड़ता होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस बात पर भी गौर करें कि 26 दिसंबर 2001 को मिस्र के एक समाचार-पत्र अल फवाद में एक छोटा-सा समाचार प्रकाशित किया गया था, जिसमें कहा गया था कि अफगान तालिबान के एक प्रमुख अधिकारी ने घोषणा की थी कि 13 दिसंबर को या इस समय के आसपास ओसामा बिन लादेन को दफनाया गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो यहाँ तक कहा जाने लगा है कि संभव है कि आतंकवादी हमला भी बुश प्रशासन ने ही कराया हो और इराक और अफगानिस्तान में अपना कब्जा बनाए रखने के लिए पश्चिमी देशों और विशेष रूप से अमेरिका और ब्रिटेन की आतंक के खिलाफ लड़ाई अभी तक जारी है रिपोर्ट में कहा गया था कि बीमारी की गंभीर ‍जटिलताओं के चलते वह स्वाभाविक मौत मर गया। तोरा-बोरा में उसे दफनाया गया और इस अवसर पर तीस अल कायदा लड़ाके मौजूद थे। करीबी परिजन और मित्र भी वहीं थे। वहाबी परंपरा के मुताबिक उसकी कब्र पर कोई निशान नहीं छोड़ा गया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस तालिबान अधिकारी का नाम नहीं छापा गया था, लेकिन उसका दावा था कि उसने कफन में लिपटे ओसामा को देखा था। तब वह कमजोर लेकिन शांतचित्त और आत्मविश्वास से भरा लग रहा था। तब अमेरिका और ब्रिटेन में क्रिसमस का शोर था और किसी ने भी इस खबर पर ध्यान ही नहीं दिया। इसके बाद भी लादेन के टेप सामने आते रहे हैं और उसको पकड़ने पर अरबों डॉलर खर्च किए जा चुके हैं लेकिन वह तो धुँए की तरह गायब हो गया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब तो यहाँ तक कहा जाने लगा है कि संभव है कि आतंकवादी हमला भी बुश प्रशासन ने ही कराया हो और इराक और अफगानिस्तान में अपना कब्जा बनाए रखने के लिए पश्चिमी देशों और विशेष रूप से अमेरिका और ब्रिटेन की आतंक के खिलाफ लड़ाई अभी तक जारी है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हॉलीवुड अभिनेता चार्ली शीन ने अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से कहा है कि वे आतंकवादी हमलों की दुबारा जाँच कराएँ क्योंकि हो सकता है कि हमलों के पीछे बुश सरकार का ही हाथ हो। उन्होंने अपनी शॉर्ट फिल्म '20 मिनट्‍स विद द प्रेसीडेंट' के जरिए यह दावा किया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका दावा है कि बुश प्रशासन हमलों के पीछे था जिसे इसके बाद इराक युद्ध को न्यायसंगत ठहराने का कारण मिल गया था। उनका यहाँ तक दावा है कि आतंकवादी हमले के समय तक ओसामा बिन लादेन भी सीआईए के साथ काम कर रहा था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-4513540248220744405?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/4513540248220744405/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=4513540248220744405' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/4513540248220744405'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/4513540248220744405'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/09/3.html' title='ओसामा बिन लादेन की हकीकत क्या....3'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-552272763115942791</id><published>2009-09-14T04:23:00.000-07:00</published><updated>2009-09-14T04:23:40.210-07:00</updated><title type='text'>ओसामा बिन लादेन की हकीकत क्या.....Part -2</title><content type='html'>Part -2&lt;br /&gt;हाल ही में अमेरिका और ब्रिटेन में एक किताब आई है, जिसका शीर्षक है 'ओसामा बिन लादेन : डैड ऑर अलाइव'। राजनीतिक विश्लेषक और दार्शनिक प्रोफेसर डेविड रे ग्रिफिन की इस किताब में ओसामा की संभावित मौत और पश्चिमी देशों द्वारा इसे छिपाने को लेकर विस्तृत और तर्कसंगत जानकारी दी गई है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस पुस्तक में दावा किया गया है कि किडनी के फेल होने से या इससे संबंधित किसी बीमारी की शिकायत से ओसामा की मौत हो चुकी है और यह 13 दिसंबर, 2001 या इसके आसपास की घटना हो सकती है। इस समय वह वजीरिस्तान की सीमा से लगे तोरा बोरा की पहाडि़यों में रह रहा था। उनका मानना है कि मुस्लिम धार्मिक नियमों के अनुरूप 24 घंटों के भीतर ही उसको दफन भी कर दिया गया। उसकी कब्र को भी चिन्हित नहीं किया गया है क्योंकि वहाबी मुस्लिमों में ऐसा ही रिवाज है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेखक का दावा है कि इस तारीख के बाद के बहुत से टेपों में दुनिया को यह भरोसा दिलाया गया है कि ओसामा जिंदा है। उनका यहाँ तक कहना है कि ये टेप भी फर्जी हैं और इनका उद्‍देश्य है कि इराक और अफगानिस्तान में चल रहे आतंक के खिलाफ युद्ध के लिए दुनिया के समर्थन और सहायता को सुनिश्चित किया जा सके। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ग्रिफिन की बात को समझने के लिए हमे गौर करना होगा कि 11 सितंबर को आतंकी हमले के बाद पश्चिम की क्या प्रतिक्रिया थी? एक महीने के दौरान ही 7 अक्टूबर को अमेरिका और ब्रिटिश विमानों ने तोरा-बोरा क्षेत्र पर बड़े हवाई हमले किए थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस सैन्य हमले में इस बात को नकार दिया गया था कि इससे पहले अल कायदा के आधिकारिक बयानों में अरब प्रेस को जानकारी दी गई थी कि 11 सितंबर होने वाले हमलों में उसका कोई हाथ नहीं था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इतना ही नहीं 28 सितंबर को और आतंकवादी हमले के एक पखवाड़े के बाद 28 सितंबर को चौथी बार ओसामा का कहना था कि मैं पहले ही कह चुका हूँ कि मैं शामिल नहीं हूँ। एक मुस्लिम होने के नाते मैं यथासंभव झूठ बोलने से बचता हूँ। मुझे कोई जानकारी नहीं है और न ही मैं निर्दोष महिलाओं, बच्चों और लोगों की हत्याओं को प्रशंसा योग्य कृत्य नहीं मानता'। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तोरा-बोरा पर अमेरिकी, ब्रिटिश हमले के कुछेक घंटों बाद ही 7 अक्टूबर को अपने पहले वीडियो टेप में ओसामा सैनिक ड्रेस और इस्लामिक हैडड्रेस में दिखा था। कंधे पर असाल्ट राइफल लटकी हुई थी और तब वह पीला और कमजोर दिख रहा था। अपने भाषण में उसने बुश को कोसा था, लेकिन तब भी आतंकवादी हमले की जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया था।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-552272763115942791?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/552272763115942791/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=552272763115942791' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/552272763115942791'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/552272763115942791'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/09/part-2.html' title='ओसामा बिन लादेन की हकीकत क्या.....Part -2'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-8632442885000056455</id><published>2009-09-14T04:21:00.000-07:00</published><updated>2009-09-14T04:21:31.227-07:00</updated><title type='text'>ओसामा बिन लादेन: हकीकत क्या है?</title><content type='html'>part-1&lt;br /&gt;परत दर परत..... ..... विश्लेषण..... ..... &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पश्चिमी देशों विशेष रूप से अमेरिका और ब्रिटेन लगातार इस बात का दावा करते रहे हैं कि विश्व का खूँखार आतंकवादी ओसामा बिन लादेन जिंदा है और वह समय समय पर अपनी धमकियों से इस बात की पुष्टि करता रहता है, लेकिन अब पश्चिमी देशों में यह धारणा जोर पकड़ रही है कि वास्तव में ओसामा बिन लादेन कम से कम सात वर्ष पहले ही मर चुका है और उसे जिंदा रखने का काम पश्चिमी देशों की सरकारें कर रही हैं ताकि आतंकवाद के खिलाफ कथित युद्ध को तब तक चलाया जा सके जब‍ तक कि उनके उद्‍देश्य पूरे नहीं हो जाते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्या यह नहीं हो सकता है कि अमेरिका पर आतंकवादी हमलों के शुरुआती दिनों के बाद से जो ऑडियो और वीडियो उसके नाम पर जारी किए गए हैं, वे सभी फर्जी हैं? क्या यह संभव नहीं है कि ओसामा को जिंदा बनाए रखने का काम ब्रिटिश और अमेरिकी खुफिया एजेंसियाँ कर रही हैं ताकि आतंक के खिलाफ युद्ध में अपने यूरोपीय सहयोगी देशों की मदद लेती रहें? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ओसामा के जिंदा होने की धारणा के ठीक विपरीत बहुत सारे सबूत इस ओर इशारा करते हैं कि इन महत्वपूर्ण तथ्‍यों पर भी ध्यान देने की जरूरत है। अमेरिका की स्पेक्टेटर पत्रिका में अमेरिका खुफिया सेवा के पूर्व अधिकारी और वरिष्ठ संपादक एंजेलो एम. कोडविला ने स्पष्ट रूप से कहा था कि 'सारे सबूत यह दर्शाते हैं कि आज ओसामा बिन लादेन की तुलना में एल्विस प्रेज्ली ज्यादा सजीव हैं'। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बोस्टन विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफेसर कोडविला का कहना था कि कथित तौर पर लादेन के नाम से जारी होने वाले वीडियोज में बहुत सारी खामियाँ हैं। वर्षों तक ओसामा को देखे जाने का कोई सबूत नहीं है और 2001 के अंतिम भाग तक अल कायदा नेता के जो संदेश पकड़े जाते थे उनका पकड़ा जाना पूरी तरह से बंद हो गया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका यह भी कहना है कि वे वीडियो और ऑडियो जिन्हें ओसामा की ओर से जारी किए जाने का दावा किया जाता है, वे निष्पक्ष जानकारों को प्रभावित नहीं करते। वीडियोज में तो दो तरह के ओसामा दिखाई देते हैं। कुछ में वह अरबी भाषी लोगों जैसा और सीधी पतली नाक वाला दिखता है तो कुछ में उसकी नाक छोटी‍ और मोटी लगती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ड्‍यूक विश्वविद्यालय के प्रोफेसर ब्रूस लॉरेंस का मानना है कि पहले और बाद के ऑडियो में ओसामा की भाषा बदलती गई है। पहले के ऑडियोज में वह अल्लाह और पैगम्बर मोहम्मद के नामों का हवाला देना नहीं भूलता था, लेकिन बाद के ऑडियोज में ऐसा नहीं है। उनका कहना है कि एक वीडियो में तो ओसामा की अँगुलियों में अँगूठियाँ भी हैं, जबकि उसके जैसे वहाबी धर्मावलम्बियों के लिए किसी तरह के आभूषण पहनना वर्जित है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-8632442885000056455?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/8632442885000056455/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=8632442885000056455' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/8632442885000056455'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/8632442885000056455'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/09/blog-post_14.html' title='ओसामा बिन लादेन: हकीकत क्या है?'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-981586121815455392</id><published>2009-09-14T04:19:00.001-07:00</published><updated>2009-09-14T04:19:01.181-07:00</updated><title type='text'>Ten Quotes of Gandhi Ji</title><content type='html'>Strength…&lt;br /&gt;The weak can never forgive. Forgiveness is the attribute of the strong.&lt;br /&gt; Government…&lt;br /&gt;What difference does it make to the dead, the orphans, and the homeless, whether the mad destruction is wrought under the name of totalitarianism or the holy name of liberty and democracy?&lt;br /&gt; Self-Help…&lt;br /&gt;The only tyrant I accept in this world is the still voice within.&lt;br /&gt; Government…&lt;br /&gt;It may be long before the law of love will be recognized in international affairs. The machineries of government stand between and hide the hearts of one people from those of another.&lt;br /&gt; God…&lt;br /&gt;As soon as we lose the moral basis, we cease to be religious. There is no such thing as religion over-riding morality. Man, for instance, cannot be untruthful, cruel or incontinent and claim to have God on his side.&lt;br /&gt; Life…&lt;br /&gt;There is more to life than simply increasing its speed.&lt;br /&gt; Change…&lt;br /&gt;We must be the change we wish to see.&lt;br /&gt;Self-Help…&lt;br /&gt;The best way to find yourself is to lose yourself in the service of others.&lt;br /&gt;Truth…&lt;br /&gt;The moment there is suspicion about a person's motives, everything he does becomes tainted.&lt;br /&gt; Wisdom… &lt;br /&gt;Suffering cheerfully endured, ceases to be suffering and is transmuted into an ineffable joy.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-981586121815455392?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/981586121815455392/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=981586121815455392' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/981586121815455392'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/981586121815455392'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/09/ten-quotes-of-gandhi-ji.html' title='Ten Quotes of Gandhi Ji'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-2649578191681371751</id><published>2009-09-11T03:38:00.000-07:00</published><updated>2009-09-11T03:38:44.463-07:00</updated><title type='text'>प्रेमचंद : उपन्यास सम्राट</title><content type='html'>जमींदारी, कर्जखोरी, गरीबी और उपनिवेशवाद को उकेरने वाले आदर्शोन्मुख यथार्थवादी साहित्य के कालजयी रचनाकार प्रेमचंद को बांग्ला साहित्यकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय ने उपन्यास सम्राट का नाम दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोलकाता में वणिक प्रेस के महावीर प्रसाद पोद्दार प्रेमचंद की रचनाएं बांग्ला साहित्यकार शरत बाबू को पढ़ने के लिए देते थे। एक दिन जब वह शरत बाबू के घर गये तो उन्होंने देखा कि शरत बाबू प्रेमचंद का कोई उपन्यास पढ़ रहे थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उत्सुकतावश उन्होंने उपन्यास उठाकर देखा तो शरत बाबू ने उस पर अपनी हस्तलिपि में 'उपन्यास सम्राट प्रेमचंद' लिख रखा था। बस इसके बाद से पोद्दार ने प्रेमचंद को उपन्यास सम्राट प्रेमचंद लिखना प्रारंभ कर दिया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेमचंद के बेटे और साहित्यकार अमृतराय के अनुसार वह उर्दू मासिक पत्रिका 'जमाना' के संपादक मुंशी दयानारायण निगम की सलाह पर धनपतराय से प्रेमचंद बने लेकिन उन्होंने मुंशी शब्द का स्वयं कभी प्रयोग नहीं किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह शब्द सम्मान सूचक है जिसे उनके प्रशंसको ने लगा दिया होगा। हालांकि कहते हैं कि मासिक पत्रिका 'हंस' में प्रेमचंद और कन्हैयालाल मुंशी दो सह संपादक थे चूंकि संपादक का नाम प्रेमचंद मुंशी छपता था जिसके चलते कालांतर में उनका नाम मुंशी प्रेमचंद लोकप्रिय हो गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 में वाराणसी के करीब लमही गांव में हुआ था। उनके पिता अजायबराय डाकमुंशी थे। प्रेमचंद का पहला विवाह सफल नहीं रहा और उन्होंने प्रगतिशील परंपरा के अनुरूप बाल विधवा शिवरानी से 1906 में विवाह किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सरस्वती पत्रिका के दिसंबर अंक में 1915 में प्रेमचंद की पहली कहानी "सौंत' प्रकाशित हुई थी और 1936 में अंतिम कहानी "कफन" छपी थी। बीस साल की इस अवधि में उनकी कहानियों के अनेक रंग देखने को मिलते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने हिन्दी में कल्पना के स्थान पर यथार्थवाद की शुरूआत की। हिन्दी साहित्य के स्त्री विमर्श और दलित चिंतन की जड़े प्रेमचंद के साहित्य में काफी गहराई से देखी जा सकती हैं। अपने जीवनकाल में उन्होंने 15 उपन्यास, 300 से अधिक कहानियां, 3 नाटक, 10 अनुवाद, 7 बाल पुस्तकें और अनेकों लेख लिखे लेकिन उन्हें शोहरत उपन्यास और कहानी में मिली।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उर्दू के संस्कार लेकर आये प्रेमचंद हिन्दी के युगान्तकारी रचनाकार बने। उनका निधन 8 अक्टूबर 1936 में हुआ उस वक्त वह उपन्यास "मंगलसूत्र" लिख रहे थे जो अधूरा रह गया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दिल्ली विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के प्रमुख सुधीश पचौरी ने कहा कि प्रेमचंद को केवल ग्रामीण परिवेश का रचनाकार कहना सही नहीं है। उनके साहित्य में पूरा भारत झांकता है और बड़े नगरों का भी वर्णन मिलता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने कहा कि हर साहित्यकार अपने युग का धर्म निभाता है और प्रेमचंद ने भी ऐसा ही किया। उनके दौर में किसानों की समस्याएँ मुंह फैलाये खड़ी थी। इसीलिए उस दौर में प्रेमचंद ने किसानों की समस्याओं पर अधिक लिखा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने कहा कि शहरीकरण के चलते रचनाकार शहरों से आये हैं। शहरों और मध्यमवर्गीय समाज की समस्या को उठा रहे हैं। आदिवासी जीवन पर लिखने वाले रचनाकारों की आजकल अधिकता बढ़ी है जो प्रेमचंद के साहित्य में नहीं दिखाई देता।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रसिद्ध साहित्यकार राजेन्द्र यादव ने कहा कि प्रेमचंद की 70 फीसदी से अधिक कहानियां संघर्ष और बदलते समाज को चित्रित करती हैं। प्रेमचंद के अनुगामी भी उसी यातना और संघर्ष पर लिखकर उनकी विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने कहा कि वक्त के साथ एक बड़ा अंतर यह आया है कि प्रेमचंद के साहित्य में अनुभूति दिखाई देती है जबकि वर्तमान समय के लेखकों में कहीं न कहीं इसका अभाव झलकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;युवा लेखकों से उन्होंने कहा कि वे महान रचनाकार प्रेमचंद की विषयवस्तु और दृष्टिकोण को समझने का प्रयास करें ताकि जीवन के संघर्ष की यथार्थ तस्वीर प्रस्तुत की जा सके।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-2649578191681371751?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/2649578191681371751/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=2649578191681371751' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/2649578191681371751'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/2649578191681371751'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/09/blog-post_8714.html' title='प्रेमचंद : उपन्यास सम्राट'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-8043275411182066812</id><published>2009-09-11T03:12:00.000-07:00</published><updated>2009-09-11T03:12:40.300-07:00</updated><title type='text'>मैं जिनका मुरीद हूं.. उनकी  पहली रचना उन्हीं की जुबानी</title><content type='html'>मेरी पहली रचना : मुंशी प्रेमचंद &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस वक्त मेरी उम्र कोई 13 साल की रही होगी। हिंदी बिलकुल न जानता था। उर्दू के उपन्यास पढ़ने-लिखने का उन्माद था। मौलाना शजर, पं. रतननाथ, मिर्जा रूसवा,मौलवी मुहम्मद अली हरदोई निवासी, उस वक्त के सर्वप्रिय उपन्यासकार थे। इनकी रचनाएँ जहाँ मिल जाती थी स्कूल की याद भूल जाती थी और पुस्तक समाप्त करके ही दम लेता था। उस जमाने में रेनॉल्ड के उपन्यासों की धूम थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उर्दू में उनके अनुवाद धडा़धड़ निकल रहे थे और हाथों-हाथ बिकते थे। मैं भी उनका आशिक था। स्व. हजरत रियाज ने जो उर्दू के प्रसिध्द कवि थे और जिनका हाल में देहांत हुआ है, ने रेनॉल्ड की एक रचना का अनुवाद 'हरम सरा' के नाम से किया था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी जमाने में लखनऊ के साप्ता‍‍हिक अवध पंच के संपादक स्व. मौलाना सज्जाद हुसैन ने जो हास्यरस के अमर कलाकार हैं, रेनॉल्ड के दूसरे उपन्यास का 'धोखा' या 'तिलिस्मी फानूस' के नाम से किया था। ये सारी पुस्तकें मैंने उसी जमाने में पढ़ी। और पं. रतननाथ से तो मुझे तृप्ति ही न होती थी। उनकी सारी रचनाएँ मैंने पढ़ डालीं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन दिनों मेरे पिता गोरखपुर में रहते थे और मैं भी गोरखपुर ही के मिशन स्कूल में आँठवें में पढ़ता था, जो तीसरा दर्जा कहलाता था। रेती पर एक बुकसेलर बुद्धिलाल नाम का रहता था। मैं उसकी दुकान पर जा बैठता था और उसके स्टॉक से उपन्यास ले लेकर पठ़ता था, मगर दुकान पर सारे दिन तो बैठ नहीं सकता था। इसलिए मैं उसकी दुकान से अंग्रेजी पुस्तकों की कुंजियाँ और नोट्स लेकर अपने स्कूल के लड़कों के हाथ बेचा करता था। और इसके मुआवजे में दुकान से उपन्यास घर लाकर पढ़ता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दो-तीन वर्षो में मैंने सैकड़ों उपन्यास पढ़ डाले होंगे। जब उपन्यासों का स्टॉक समाप्त हो गया तो मैंने नवलकिशोर प्रेस से ‍िनकले हुए पुराणों के उर्दू अनुवाद भी पढ़े और ' तिलिस्मी होशरूबा' के कई भाग भी पढ़े। इस वृहद तिलस्मी ग्रंथ के सत्रह भाग उस वक्त निकल चुके थे और एक-एक भाग बड़े सुपररॉयल आकार के दो-दो हजार पृष्ठों से कम न होगा। और इन 17 भागों के उपरांत उसी पुस्तक के अलग-अलग प्रसंगों पर पचीसों भाग छप चुके थे। इनमें से भी मैंने कई पढे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जिसने इतने बडे़ ग्रंथ की रचना की, उसकी कल्पनाशक्ति कितनी प्रबल होगी, इसका केवल अनुमान लगाया जा सकता है। कहते हैं, ये कथाएँ मौ‍लाना फैजी ने अकबर के विनोदार्थ फारसी में लिखी थीं। इनमें कितना सत्य हैं, कह नहीं सकता,लेकिन इतनी वृहद कथा शायद ही संसार की किसी भाषा में हो। पूरी एंसाइक्लोपीडिया समझ लीजिए। एक आदमी अपने 60 वर्ष के जीवन में उनकी नकल भी करना चाहे तो नहीं कर सकता,रचना तो दूसरी बात है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उसी जमाने में मेरे एक नाते के मामू कभी-कभी हमारे यहाँ आया करते थे। अधेड़ हो गए थे, लेकिन अब तक बिन ब्याहे थे। पास मे थोडी़ सी जमीन थी,लेकिन घरनी के बिना सबकुछ सूना था। इसलिए घर पर जी न लगता था। नातेदारियों में घूमा करते थे, और सबसे यही आशा रखते थे कि कोई उनका ब्याह करा दे। इसके‍ लिए सौ-दो सौ खर्च करने को भी तैयार थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्यों उनका ब्याह नहीं हुआ, यह आश्चर्य था। अच्छे खासे हष्ट-पुष्ट आदमी थे। बडी़-बड़ी मूँछे, औसत कद, साँवला रंग। गांजा पीते थे, इससे आँखे लाल रहती थी। अपने ढंग के धर्मनिष्ठ भी थे। शिवजी को रोजाना जल चढ़ाते थे। और मांस-मछली नहीं खाते थे। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर एक बार उन्होंने भी वही किया,जो बिन ब्याहे अक्सर किया करते हैं। एक चमारिन के नयन बाणों से घायल हो गए। वह उनके यहाँ गोबर पाथने, बैलों को सानी-पानी देने और इसी तरह के फुटकर कामों के लिए नौकर थी। जवान थी,छबीली थी और अपने वर्ग की अन्य रमणियों की भाँति प्रसन्नमुख और विनोदिनी थी। एक समय ' ‍सखी सुअरी सुन्दरी' वाली बात थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामू साहब का तृषित हृदय मीठे जल की धारा देखते ही फिसल पड़ा। बातों-बातों में उससे छेड़छाड़ करने लगे। वह इनके मन का भाव ताड़ गई। ऐसी अल्हड़ न थी। और नखरे करने लगी। केशों में तेल भी पड़ने लगा, चाहे सरसों का ही क्यों न हो। आँखों में काजल भी चमका, ओंठों पर मिस्सी भी आई और काम में ढिलाई भी शुरू हुई कभी दोपहर को आई और झलक दिखलाकर चली गई। कभी साँझ को आई और तीर चलाकर चली गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बैलों को सानी-पानी मामू साहब खुद दे दे्ते, गोबर दूसरे उठा ले जाते, युवती से बिगड़ते क्यों कर? वहाँ तो अब प्रेम उदय हो चुका था! होली में उसे प्रथानुसार एक साड़ी दी, मगर अबकी गजी की साडी़ न थ‍ी, खूबसूरत सी सवा दो रूपए की चुंदरी थी। होली की त्यौहारी भी मामूल से चौगुनी दी। और सिलसिला यहाँ तक बढ़ा कि वह चमार‍िन ही घर की मालकिन हो गई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक दिन संध्या समय चमारों ने आपस में पंचायत की। बड़े आदमी हैं तो हुआ करें, क्या किसी की इज्जत लेंगे? एक इन लाला के बाप थे कि कभी किसी मेहरिया की ओर आँख उठाकर नहीं देखा,(हालाँकि यह सरासर गलत था) और एक यह हैं कि नीच जा‍ति की बहू बेटियों पर भी डोरे डालते हैं। समझाने बुझाने का मौका न था। समझाने से लाला मानेंगे तो नहीं और कोई मामला खड़ा कर देंगे। इनके कलम घुमाने की तो देर है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसलिए निश्चय हुआ कि लाला साहब को ऐसा सबक देना चाहिए कि हमेशा के लिए याद हो जाए। इज्जत का बदला खून ही चुकाता है, &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन इससे भी कुछ उसकी पुरौती हो सकती है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दूसरे दिन शाम को जब चंपा मामू साहब के घर में आई तो उन्होंने अंदर से द्वार बंद कर दिया। महीनों के असमंजस और हिचक और धार्मिक संघर्ष के बाद आज मामू साहब ने अपने प्रेम को व्यवहारिक रूप देने का निश्चय किया। चाहे कुछ हो जाए, कुल- मरजाद रहे या जाए। बाप- दादा का नाम डूबे या उतराय! &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर चमारों का जत्था ताक में था ही इधर किवाड़ बंद हुए, उधर उन्होंने द्वार खटखटाना शुरू किया। इधर किवाड़ बंद हुए़, उधर उन्होंने द्वार खटखयाना शुरू किया।पहले तो मामू साहब ने समझा कोई आसामी मिलने आया होगा, किवाड़ बंद पाकर लौट जाएगा,लेकिन जब आदमियों का शोरगुल सुनाई दिया तो घबड़ाए। जाकर किवाड़ों की दराज से झाँका। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोई बीस पच्चीस चमार लाठियाँ लिए, द्वार रोके खड़े किवाड़ो को तोड़ने की चेष्टा कर रहे थे। अब करें तो क्या करें? भागने का कहीं रास्ता नहीं चंपा को कहीं छिपा नहीं सकते। समझ गए कि शामत आ गई। आशिकी इतनी जल्दी गुल खिलाएगी, यह जानते तो इस चमारन पर दिल आने ही क्यों देते। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उधर चंपा इन्हीं को कोस रही थी- तुम्हारा क्या बिगडेगा, मेरी तो इज्जत लुट गई। घरवाले मूड़ ही काटकर छोड़ेंगे,कहती थी, कभी किवाड़ बंद न करो हाथ-पाँव जोड़ती थी, मगर तुम्हारे सिर पर तो भूत सवार था लगी मुँह में कालिख कि नहीं? &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मामू साहब बेचारे इस कूचे में कभी न आए थे। कोई पक्का खिलाडी़ होता तो सौ उपाय निकाल लेता, लेकिन मामू साहब की जैसे सिट़टी-पिट्‍टी भूल गई। बरौठे में थर-थर काँपते 'हनुमान चालीसा' का पाठ करते खडे़ थे। कुछ न सूझता था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;और उधर द्वार पर कोलाहल बढ़ता जा रहा था, यहाँ तक कि सारा गाँव जमा हो गया। बाम्हन, ठाकुर, कायस्थ सभी तमाशा देखने और हाथ की खुजली मिटाने आ पहुँचे। इससे ज्यादा मनोरंजक और स्फूर्तिवर्द्धक तमाशा और क्या होगा कि एक मर्द और एक औरत को साथ में घर में बंद पाया जाए! फिर वह चाहे कितनी ही सभ्य और विनम्र क्यों न हो, जनता उसे किसी तरह क्षमा नहीं कर सकती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बढ़ई बुलाया गया, किवाड़ फाडे़ गए और मामू साहब भूसे की कोठरी में छुपे हुए मिले। चंपा आंगन में खड़ी रो रही थी। द्वार खुलते ही भागी। कोई उससे कुछ नहीं बोला। मामू साहब भागकर कहाँ जाते? वे जानते थे, भागने का कोई रास्ता नहीं है। मार खाने के लिए तैयार बैठे थे। मार पड़ने लगी और बेभाव की पड़ने लगी। जिसके हाथ जो कुछ भी लगा- जूता, छाता, छड़ी, लात, घूँसा सभी अस्त्र चले। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यहाँ तक कि मामू साहब बेहोश हो गए। और लोगों ने उन्हें मुर्दा समझ कर छोड़ दिया। अब इतनी दुर्गति के बाद वह बच भी गए तो गाँव में नहीं रह सकते और उनकी जमीन पट्‍टेदारों के हाथ आएगी। इस दुर्घटना की खबर उड़ते- उड़ते हमारे यहाँ भी आ पहुँची। मैंने भी उसका खूब आनंद उठाया। पिटते समय उनकी रूपरेखा क्या रही होगी,इसकी कल्पना करके मुझे खूब हँसी आई। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक महीने तक तो वह हल्दी और गुड़ पीते रहे। ज्यों ही चलने- फिरने लायक हुए हमारे यहाँ आए। यहाँ अपने गाँव वालों पर डाके का इस्तगासा दायर करना चाहते थे। अगर उन्होंने कुछ दीनता दिखाई होती तो शायद मुझे हमदर्दी हो जाती, लेकिन उनका वही दमखम था। मुझे खेलते या उपन्यास पढ़ते देखकर बिगड़ना और रौब जमाना और पिताजी से शिकायत करने की धमकी देना, यह अब मैं क्यों सहने लगा था!&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आखिर एक दिन मैंने यह सारी दुर्घटना एक नाटक के रूप में लिख डाली और अपने मित्रों को सुनाई। सब के सब खूब हँसे मेरा साहस बढ़ा। मैंने उसे साफ-साफ लिखकर वह कॉपी मामू साहब के सिरहाने रख दी और स्कूल चला गया। दिल में कुछ डर भी था, कुछ खुश भी था और कुछ घबराया हुआ भी था। सबसे बड़ा कौतुहल यह था कि ड्रामा पढ़कर मामू साहब क्या कहते हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्कूल में जी न लगता था। दिल उधर ही टंगा हुआ था। छुट्‍टी होते ही घर चला गया था,मगर द्वार के समीप आकर ही पाँव रूक गए थे। भय हुआ कहीं मामू साहब मुझे मार न बैठे, लेकिन इतना जानता था कि वह एकाध थप्पड़ से ज्यादा मुझे मार न सकेंगे, क्योंकि मैं मार खाने वाले लड़कों में न था। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मगर यह क्या मामला है! मामू साहब चारपाई पर नहीं है, जहाँ वह नित्य लेटे हुए मिलते थे। क्या घर चले गए? आकर कमरा देखा तो &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वहाँ भी सन्नाटा मामू साहब के जूते, कपड़े, गठरी सब लापता। अंदर जाकर पूछा तो मालूम हुआ, मामू साहब किसी जरूरी काम से चले गए। भोजन तक नहीं किया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैंने बाहर आकर सारा कमरा छान मारा मगर मेरा ड्रामा- मेरी वह पहली रचना- कहीं न मिली। मालूम नहीं मामू साहब ने उसे चिरागअली के सुपुर्द कर दिया या अपने साथ स्वर्ग ले गए? &lt;br /&gt;------0-----0------0------0------0--------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-8043275411182066812?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/8043275411182066812/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=8043275411182066812' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/8043275411182066812'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/8043275411182066812'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/09/blog-post_11.html' title='मैं जिनका मुरीद हूं.. उनकी  पहली रचना उन्हीं की जुबानी'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-7148950669561244097</id><published>2009-09-10T00:18:00.000-07:00</published><updated>2009-09-10T00:18:23.941-07:00</updated><title type='text'>झरिया एक्शन प्लान-बहुआयामी योजना को सरकार की हरी झंडी</title><content type='html'>झरिया एक्शन प्लान-बहुआयामी योजना&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लोकनाथ तिवारी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहुप्रतीक्षित झरिया एक्शन प्लान को इन्फ्रास्ट्रक्चर कैबिनेट कमेटी की मंजूरी मिल गई है। झरिया और रानीगंज कोलफील्ड में छिपे बहुमूल्य कोकिंग कोल के भंडार को निकालने, यहां पर बसे लाखों लोगों के पुनर्वास, भूगर्भ खदानों में लगी आग को बुझाने तथा इस क्षेत्र के विकास के लिए यह योजना अति महत्वपूर्ण है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सर्व प्रथम इस योजना का प्रस्ताव वर्ष 1999 में किया गया और कोयला मंत्रालय इसे केन्द्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के लिए भेज दिया था। राज्य सरकार ने भी इस योजना को गत वर्ष मंजूरी दे दी थी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस योजना के तहत भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) और ईस्टर्न कोलफील्ड्स (ईसीएल) क्षेत्र में बसे लोगों का पुनर्वास, बुनियादी सुविधाओं का विकास और खदानों में लगी आग को बुझाने के लिए अनुमानित 9657.61 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। इसमें से 7028.40 करोड़ रुपए झरिया कोलफील्ड और 2629.21 करोड़ रुपए रानीगंज कोलफील्ड क्षेत्र के विकास पर खर्च किए जाएंगे। इसके अलावा विभिन्न एन्वायरमेंटल मेजर एंड सब्सिडेंस कंट्रोल (ईएमएससी) स्कीम के लिए 116.23 करोड़ रुपए पहले ही दिए जा चुके हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;यह किसी भी सरकारी कम्पनी द्वारा शुरू की जाने वाली सबसे बड़ी पुनर्वास व मुआवजा प्रदान करने की योजना है जो वर्ष 1999 से ही सरकार के अनुमोदन के लिए अटकी पड़ी थी। इसे पूरा करने मंें 10 वर्षों का समय लगेगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस योजना के तहत लगभग 5,00,000 लोगों को झारखंड के झरिया क्षेत्र के खतरनाक इलाके से निकालकर पुनर्वास किया जाएगा। इस योजना के क्रियान्वयन से 13 बिलियन टन कोयला (जिसमें 1,464 मिलियन टन कोकिंग कोल है) के खनन में मदद मिलेगी जो कोल इंडिया की सहायक कम्पनी भारत कोकिंग कोल लिमिटेड (बीसीसीएल) और ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (ईसीएल) के अधीन है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कोल इंडिया के चेयरमैन पी. एस. भट्टाचार्य ने कहा कि यह दुनियां की सबसे बड़ी पुनर्वास योजना है, जिसमें लगभग 5,00,000 लोगों को उचित आवास व परिवेश मुहैया कराया जाएगा। कम्पनी इस खतरनाक क्षेत्र में रहने वाले 78,000 से अधिक परिवारों को सुरक्षित क्षेत्र में बसाएगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीसीसीएल के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार इस योजना की मंजूरी कम्पनी के दीर्घकालिक हित में है। झरिया कोलफील्ड के विकास से इस्पात कम्पनियों को न केवल बहुमूल्य कोकिंग कोल आसानी से उपलब्ध होगा बल्कि इससे बीसीसीएल का भी पुनरुद्धार होगा जो विकास के लिए सतत प्रयास कर रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झरिया को आबादी से मुक्त करने से भारी पैमाने पर कोकिंग कोल का उत्पादन किया जा सकेगा। लोगों के विस्थापन से बीसीसीएल ओपेन कास्ट खनन कर सकेगी जो फिलहाल भूगर्भ खनन करती है। इससे कम्पनी की 62 खदानों में से 41 खदानें नुकसान में चल रही हैं, जिनको प्रति टन 1,000 रुपए का नुकसान हो रहा है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीसीसीएल के कर्मचारियों के अलावा इस योजना के अंतर्गत इस क्षेत्र में स्थित उद्योगों, दुकानों तथा अन्य प्रतिष्ठानों को हटाकर सुरक्षित इलाके में ले जाया जाएगा। पश्चिम बंगाल के रानीगंज इलाके का कुछ क्षेत्र भी इस योजना में शामिल किया गया है। वहां से भी लोगों को हटाया जाएगा। रिपोर्ट के अनुसार झरिया इलाके में छिटपुट विरोध किया &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बीसीसीएल के चेयरमैन व प्रबंध निदेशक टी. के. लाहिड़ी के अनुसार इस तरह के कार्यक्रमों की सफलता के लिए राजनैतिक आमसहमति बनाकर जागरुकता फैलानी चाहिए, जिससे लोगों को इस कार्यक्रम से होने वाले लाभ के बारे में जानकारी दी जाए। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गौरतलब है कि झरिया के लगभग 67 कोल ब्लॉकों में आग लगी हुई है, तथा इस क्षेत्र की आबादी 4,00,000 लाख से अधिक है। आग को बुझाने तथा खनन शुरू करने के लिए यहां स्थित लोगों को अन्यत्र बसाए जाने की जरूरत होगी। इसे ध्यान में रखकर झरिया एक्शन प्लान नामक इस कार्य योजना का निर्माण किया गया। वैज्ञानिक तरीके से खनन शुरू करने के बाद ही खदानों में आग बुझाई जा सकेगी। कोल इंडिया के एक अधिकारी के अनुसार झरिया एक्शन प्लान के क्रियान्वयन से कोल इंडिया ऐसी स्थिति में आ सकेगी जिससे देश की इस्पात मिलों की कोकिंग कोल की जरूरतों को पूरा किया जा सके। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कम्पनी का अनुमान है कि झरिया एक्शन प्लान के लागू होने के 10 वर्षों में आग पर काबू पा लिया जाएगा तथा वर्ष 2020 से उत्पादन शुरू हो जाएगा। कम्पनी नौ ओपेन कास्ट कोयला खदानों में कार्य शुरू करेगी जिससे इस्पात उद्योग की जरूरतों को पूरा किया जा सके। उन्होंने कहा कि यदि कार्य योजना को वर्ष 2031 तक लागू कर दिया जाए तो घरेलू इस्पात उद्योग की 50 फीसदी जरूरतों को पूरा कर लिया जाएगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस्पात कम्पनियां&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय इस्पात कम्पनियों की उत्पादन क्षमता विस्तार की योजना के मद्देनजर देश में कोकिंग कोल की मांग बढ़ेगी। वर्तमान समय मेंे इस्पात कम्पनियां अपनी कोकिंग कोल की जरूरतों का अधिकांश भाग आयात के जरिए पूरा करती हैं, लेकिन अनुमान है कि निकट भविष्य मे देश में कोकिंग कोल के उत्पादन में महत्वपूर्ण वृद्धि होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारत की सबसे बड़ी इस्पात उत्पादक कम्पनी स्टील ऍथारिटी ऑफ इंडिया लिमिटेड (सेल) द्वारा लगाए गए अनुमान के अनुसार झरिया कोल फील्ड में 2.8 बिलियन टन कोकिंग कोल का भंडार है। स्टील का उत्पादन वर्ष 2011-12 तक बढ़कर 65 मिलियन टन होने की संभावना के साथ ही कोकिं ग कोल की वार्षिक मांग लगभग 45 मिलियन टन हो जाएगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;देश में घरेलू कोयले का भंडार 93 बिलियन टन है जिसका 13 फीसदी भाग ही कोकिंग कोल है तथा शेष थर्मल कोल है। इसमें से 28 फीसदी प्राइम कोकिंग कोल और शेष मीडियम और सेमी कोकिंग कोल है। एक ब्लास्ट फर्नेस में 70 फीसदी प्राइम और 30 फीसदी मीडियम कोकिंग कोल है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भारतीय इस्पात उद्योग के विकास में सबसे बड़ी बाधा प्राइम कोकिंग कोल की अनुपलब्धता है। वर्तमान योजना के अनुसार कोकिंग कोल का उत्पादन 8 मिलियन टन से बढ़ाकर वर्ष 2024-25 तक 18 मिलियन टन करने का लक्ष्य रखा गया है जबकि इस्पात उद्योग की मांग 97 मिलियन टन की होगी। मांग व आपूर्ति को देखते हुए झरिया एक्शन प्लान का महत्व बढ़ जाता है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झरिया कोल फील्ड में स्थित कोयला उत्पादन की क्षमता को आंकने के लिए हाल का उदाहरण लिया जा सकता है जिसमें आग से प्रभावित धनबाद-पाथरडीह रेलवे लाइन को हटा दिया गया। झरिया कोलफील्ड के इस छोटी सी जगह की खुदाई से वर्ष 2006-07 से अब तक 1 मिलियन टन से अधिक कोयले का उत्पादन हुआ है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बड़े पैमाने पर पुनर्वास&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झरिया एक्शन प्लान पैकेज मेंे कोयला खदानों में लगी आग से प्रभावित क्षेत्रों के पांच लाख लोगों के लिए लगभग 79,179 मकानों का निर्माण सुरक्षित जगहों पर किया जाना है। इस योजना के तहत इन लोगों के लिए सुरक्षित जगहों पर बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। इन क्षेत्रों में लगी आग में से कुछ तो खदानों के राष्ट्रीयकरण के पहले से जल रही है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;खदानों में लगी जानलेवा आग में प्राइम ग्रेड का कोकिंग कोल खाक हो रहा है, जिसमें अबतक लगभग 37 मिलियन टन जल चुका है। इस योजना के मूल भाग में खदानों में लगी आग पर काबू पाना, यहां के लोगों का विस्थापन व पुनर्वास तथा खदानों में ओपेन कास्ट माइनिंग से कोकिंग कोल व कोयले को बाहर निकालना शामिल है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस महती योजना के पहले चरण के तहत झरिया से 10 किमी दूर बेलगुरिया बाजार में 46,000 मकानों का निर्माण किया जाएगा। दूसरे चरण में अन्य 34,000 मकान का निर्माण बेलियापुर में बनाया जाएगा जिस पर कुल 20,000 करोड़ रुपए खर्च किए जाएंगे। झारखंड सरकार लोगों के विस्थापन व पुनर्वास पर सहमत है जबकि कुछ कोयला यूनियनें इसका विरोध कर रही हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झरिया डेवलपमेंट ऍथारिटी के एक अधिकारी ने कहा कि पुनर्वास के दौरान सर्वाधिक संवेदनशील इलाकों में रहने वालों को प्राथमिकता दी जाएगी। नई कॉलोनियों में विद्यालय, अस्पताल और बाजारों का निर्माण भी किया जाएगा। झरिया से विस्थापित लोगों के पुनर्वास के लिए बेलगुरिया में निर्माणाधीन योजना राज्य सरकार की पायलट परियोजना है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झारखंड सरकार ने झरिया रीहैबिलिटेशन डेवलपमेंट ऍथारिटी (जेआरडीए) का गठन किया है, जिसका मुख्य कार्य यहां के विस्थापितों के लिए गैर कोयला क्षेत्रों में बेहतर टाउनशिप का निर्माण करना है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसके साथ ही बीसीसीएल को अपने कर्मचारियों को भी खतरनाक इलाके से निकालकर सुरक्षित जगहों पर पुनर्वास करना होगा। जेआरडीए और बीसीसीएल द्वारा इस योजना को हाउसिंग एंड अर्बन डेवलपमेंट कॉर्पोरेशन की मदद से पूरा किए जाने की संभावना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;धन की उपलब्धता&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;झरिया एक्शन प्लान के लिए धन की उपलब्धता कोई समस्या नहीं है। बीसीसीएल की होल्डिंग कम्पनी कोल इंडिया लिमिटेड गत तीन वर्षों से अपनी लाभजनक इकाइयों से प्रति टन 6 रुपए का शुल्क वसूलती है, जिससे झरिया और रानीगंज पुनर्वास योजना का कार्य किया जाएगा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे प्रति वर्ष 400 करोड़ रुपए का संग्रह किया जाता है। हर तरह के कोयले (कोकिंग व नॉन कोकिंग) पर उत्पाद शुल्क में वृद्धि कर 10 रुपए किया गया है, जो पहले 3.50 रुपए प्रति टन नॉन कोकिंग पर तथा 4.25 रुपए कोकिंग कोल पर था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इससे प्रति वर्ष 240 करोड़ रुपए जमा होने का अनुमान है। इसके अलावा आग पर काबू पाने की योजना के लिए बीसीसीएल को कार्बन क्रेडिट मिलने की आशा है जिससे क्योटो प्रोटोकॉल की क्लीन डेवलपमेंट मेकेनिज्म के लिए यह क्वालिफाई कर लेगी। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(कोल इनसाइट्स)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-7148950669561244097?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/7148950669561244097/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=7148950669561244097' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/7148950669561244097'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/7148950669561244097'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/09/blog-post_10.html' title='झरिया एक्शन प्लान-बहुआयामी योजना को सरकार की हरी झंडी'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-3748082230445626577</id><published>2009-09-08T01:17:00.000-07:00</published><updated>2009-09-08T01:18:16.337-07:00</updated><title type='text'>जीवन का सार</title><content type='html'>पत्ते पर बैठी जल की एक बूंद नीचे बहती नदी के जल को देख रही थी। हहर-हहर करता जल वेग से आगे बढता जा रहा था। उछलती तरंगों से निकलती अनेक बूंदे खेलती हंसती नाचती पुन: नदी के जल में विलीन हो जाती। पत्ते पर बैठी बूंद उदास थी, " ओह, मैं कितनी अकेली हूं ... कोई मेरे साथ खेलता नहीं .... मेरी सुध नहीं लेता। "&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                हवा ने उसका रोना सुना। उस पर तरस आया। उसने पत्ते के हिला दिया कि बूंद फिलसकर नदी में जा मिले। बूंद अकर्मण्य थी। वह कसकर पत्ते से चिपक गई, " मुझे गिरने से डर लगता है। वैसे भी नदी के जल में मिलकर अपना अस्तित्व खो बैठूंगी। "  नदी जल की बूंद आगे बढ हुई सागर में विलीन होकर शाश्वत में मिल गई। पत्ते पर की बूंद वहीं बैठी-बैठी सूखकर समाप्त हो गई। बूंद की सबसे बडी भूल थी कि वह स्वयं को अपने जन्मदाता जल से अलग मान बैठी। वह भूल गई कि उसका अस्तित्व जल से है। दूसरी भूल थी अर्कमण्यता। वह कर्म करने से डरती रही, अत: नष्ट हो गयी। बूंद और जल का सम्बन्घ आत्मा-परमात्मा के सम्बन्घ के समान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                इतने बडे विश्व मे बच्चा अकेला आता है। परिवार, समाज में अन्य लोगों से मिल-जुलकर, सीखकर गुवों का विकास करते हुए उन सबका हिस्सा बन जाता है। सबके बीच रहकर भी वह अपना अलग अस्तित्व बनाये रखता है। निरन्तर अच्छे कार्य करता हुआपरमात्मा में विलीन हो जाता है, नदी की बूंदों की तरह।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;                कृष्ण ने कहा है कि कर्म करना मनुष्य का घर्म है। कर्म किसी इच्छा या उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता है। शास्त्रों में कहा गया है," ह्रदय से इच्छा रूपी विकार हो निकाल दो। " यह कथन भ्रम की स्थिति पैदा करता है क्योंकि इच्छा रहित ह्रदय सूखे मरूस्थल समान है, जिसमें कर्म रूपी पौघे कीएक भी कोपल नहीं खिलती। इस भ्रम का भी कृष्ण ने गीता में स्पष्ट शब्दों में तोडा है ... मनुष्य!  तू कर्म कर। कर्म अपरिहार्य है। तेरे अघिकार में सिर्फ कर्म करना है। उसका फल मिलेगा या नहीं, कैसा फल मिलेगा, इसका निर्णय तेरे अघिकार में नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;               इस कथन की सच्चाई प्रत्येक मनुष्य अनुभव करता है। पुरे मनोयोग से व्यापार शुरू किया, पर व्यापार में सफलता नहीं मिली, मेहनत से पढाई की लेकिन अपेक्षित अंक नही आए। ऎसे अनेक उदाहरण मिलते है। अज्ञानी व्यक्ति अपने अतिरिक्त और सबको दोष देने लगता है। ज्ञानी समझ जाता है, " फल प्राप्ति मेरे अघिकार में नहीं है। " अकर्मण्य व्यक्ति का तर्क उभरता है, " फल मेरे वश में नहीं, तो कर्म क्यों करू। जो प्रारंभ में होगा, मिल जायेगा। " यह असंतगत तर्क है। कर्म मनुष्य का घर्म है। भूखे के सामने खाना रखा है। वह हाथ बढा, निवाला तोडकर मुंह में डालने का कर्म नहीं करता कि किस्मत में होगा, तो खिला देगा। वह भूल गया कि किस्मत में भोजन प्राप्ति लिखी थी। खाने का कर्म तो स्वयं ही करना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;            इच्छायें जागकर मनुष्य को कर्म करने क लिए पे्ररित करती है। इच्छा नहीं, तो कर्म नहीं। इच्छाविहीन और विरक्ति, दोनों भाव मनुष्य के भीतर कर्म न करने की सुस्ती पैदा करती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;           दिवाकर के पिता के पास अपार घन-दौलत थी। उसके अक्सर पिता को यह कहते सुना कि उसके पास जितनी दौलत है, आने वाली सात पुश्तें काम न करें, बैठकर खा सकती है। उसके मन में पढ-लिखकर कुछ बनकर, घनार्जन की इच्छा ही खत्म हो गई, जीने के लिए घन चाहिये। पिता के पास इतना घन है ही। मैं क्यों पढे। खाली बैठ समय कैसे गुजरे ? आस-पास सब लोग पढाई में लगे रहते है। अकेला खेले कैसे ? पढाई छोड दी। अच्छी मनोरंजन किताब कैसे बढे ? खाली बैठे टीवी भी कब तक देखे ? पेट में भूख जागे, उससे पहले ही सामने तरह-तरह के व्यंजन परोस दिये जाते। उसकी खाने में अरूचि हो गई। इच्छाविहीन हो वह अर्कमण्य बना। अपने आपमें छटपटाता छोटी उम्र में ही मर गया। इसलिये नदी की बूंदों सरीखा जीवन जियो। नदी जल में मिलकर भी अपना अस्तित्व बचा रखो। जब लहरें उठकर गिरतीं, बूंदे अलग-अलग अठखेलियां करती, आनन्द सहसूस करती, फिर नदी के जल में मिल जाती। अच्छे कर्मो द्वारा अपनी अलग पहचान बनाकर ब्रह्य में लीन होने पर दुनिया याद भी रखती है। मोक्ष भी प्राप्त होता है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-3748082230445626577?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/3748082230445626577/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=3748082230445626577' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/3748082230445626577'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/3748082230445626577'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/09/blog-post_08.html' title='जीवन का सार'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-6039596251403717982</id><published>2009-09-02T03:02:00.000-07:00</published><updated>2009-09-02T03:04:07.422-07:00</updated><title type='text'>बेसहारों का सहारा थीं मदर टेरेसा</title><content type='html'>5 सितम्बर: पुण्यतिथि पर विशेष&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्व इतिहास ऐसे अनेकों समाजसेवियों तथा समाज के प्रति समर्पित सद् पुरुषों, महात्माओं, ऋषियों, मुनियों व सन्तों के नामों से भरा पड़ा है, जिन्होंने अपना सारा जीवन गरीबों, दीन-दुखियों तथा असहाय लोगों की सेवा हेतु समर्पित कर दिया। प्रत्येक युग में ऐसे अनेकों अवतारी अथवा अवतारी कही जा सकने वाली हस्तियों ने जन्म लिया है। ऐसी ही एक अवतार रूपी महिला का नाम था मदर टेरेसा। 27 अगस्त 1910 को मैकेडोनिया में जन्मी मदर टेरेसा का सम्बन्ध अल्बानियाई परिवार से था। बताया जाता है कि 12 वर्ष की आयु में ही उन्हें ईश्वर की आवाज का आभास होने लगा था। चूंकि वे एक ईसाई परिवार में जन्मीं थीं इसलिए स्वाभाविक रूप से उनका पहला झुकाव अपने आराध्य प्रभु ईसा मसीह की ओर ही था। अत: बाल्यकाल में ही उन्होंने यीशू मसीह का प्रेम सन्देश जन-जन तक पहुंचाने का निर्णय लिया। 18 वर्ष की आयु में मदर टेरेसा ने अपना घर व परिवार त्याग दिया तथा एक ऐसी मिशनरी में शामिल हो गईं जोकि भारत में भी अपना कामकाज देखती थी। डबलिन में कुछ महीनों के प्रशिक्षण के बाद उन्हें मिशनरी की ओर से भारत भेज दिया गया। यहां 24 मई 1931 को मदर टेरेसा ने एक साधारण नन के रूप में अपना कार्यभार ग्रहण किया।हालांकि मदर टेरेसा ने भारत की धरती पर कदम रखने के बाद सर्वप्रथम कोलकाता में 1931 से 1948 तक सेंट मेरी हाई स्कूल में एक शिक्षक के रूप में कार्य किया। परन्तु इस दौरान उन्होंने कोलकाता में रहते हुए अपने स्कूल की चहारदीवारी के बाहर गरीबी, भुखमरी तथा असहाय लोगों की जिस पीड़ा का दर्शन किया व उसे महसूस किया, उस पीड़ा ने मदर टेरेसा को अधिक दिनों तक उस स्कूल में शिक्षक के रूप में नहीं रहने दिया। मदर टेरेसा अपने स्कूल से बचे हुए समय में उन गरीबों व दुखियारों से मिलने उनकी गन्दी बस्तियों में अधिक से अधिक समय उन्हीं के साथ रहकर उनकी सेवा में बितातीं। दरअसल मदर टेरेसा प्रभु यीशू मसीह के प्रेम, सहयोग व सहायता के सन्देश को गिरिजाघरों में दिए जाने वाले पादरी के प्रवचनों तथा बाईबल में प्रकाशित प्रभु के कथनों से बाहर निकाल कर उसे धरातल पर लाना चाहती थीं। मदर टेरेसा इन दीन-दुखियों की सहायता के प्रति इतनी समर्पित व गंभीर हो गईं की 1948 में उन्हें अपनी मिशनरी की ओर से भी इस बात की इजांजत मिल गई कि वे शिक्षक का कार्य छोड़कर गरीब व असहाय लोगों की सहायता हेतु स्वयं को समर्पित कर दें। उन्होंने ऐसा ही किया। बिना किसी आर्थिक फंड के मदर टेरेसा ने मिशनरींज की मुख्यधारा से अलग हटकर तथा ईसाई धर्म प्रचार के शुद्ध एवं सीधे लक्ष्य को त्याग कर केवल और केवल सेवा को ही अपना धर्म वर् कत्तव्य मानकर उसी पर अमल करना शुरु कर दिया। खुले आसमान के नीचे जमीन पर बैठकर मदर टेरेसा ने उन गरीबों के बच्चों को जब पढ़ाना शुरु किया उस समय मदर के इस जज्बे को देखकर आम आदमी चकित रह गया। चिलचिलाती धूप हो या कंपकंपा देने वाली ठंड या फिर तेंज बारिश, दिन हो या अंधियारी रात, मदर को हर समय इन्हीं दीन-हीन दुखियों के पास देखा जाने लगा। मदर की इस तपस्या व त्याग का असर यह हुआ कि आम लोगों के बीच उनकी चर्चा होने लगी तथा आहिस्ता आहिस्ता समाज सेवा की भावना रखने वाले स्वयंसेवी मदर की ओर आकर्षित होने लगे।मदर समाज के प्रत्येक उस व्यक्ति के सामने मददगार के रूप में खड़ी दिखाई देतीं जो प्राय: अपने ही घर परिवार, बिरादरी या समाज की उपेक्षा, उत्पीड़न या अवहेलना का शिकार होता था। आज के जमाने की सच्चाई भी यही है कि कोई भी वृद्ध व्यक्ति अपने ही परिवार में एक बोझ समझा जाने लगा है। दुर्भाग्यवश यदि किसी व्यक्ति को कुष्ठ रोग अथवा कोई ऐसी अन्य संक्रामक बीमारी हो जाती है तो उसके अपने परिवार के सदस्य ही उसे नंफरत की नज़र से देखने लगते हैं। उसे अछूत समझा जाने लगता है। इसी प्रकार यदि किसी गरीब परिवार की महिला तांकतवर लोगो के हाथों बलात्कार का शिकार हो जाए तो समाज ऐसी महिला को जीने नहीं देता। ऐसे लोगों के समक्ष आत्महत्या के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं बचता। परन्तु मदर ऐसे प्रत्येक व्यक्ति के समक्ष अवतार के रूप में खड़ी हो जातीं थीं। वे उसे सफलतापूर्वक यह समझातीं कि उसके साथ जो कुछ गुंजर रहा है उसमें चूंकि उसका कोई दोष नहीं है लिहाज़ा आत्महत्या का प्रयास करना ग़लत हैे। और इस प्रकार उसे अपनी ही छत्रछाया में अपने होम में रखकर उसे पूरा मान सम्मान देतीं व नए सिरे से नया व सम्मानपूर्ण जीवन जीने हेतु उसे प्रेरित करतीं। मदर टेरेसा की ऐसी ही कारगुज़ारियों ने आम आदमी को यह सोचने के लिए मजबूर कर दिया था कि वास्तव में मदर एक साधारण इंसान थीं या कलयुग के इस दौर में खुदा की तरंफ से इंसान के रूप में धरती पर भेजा गया एक फरिश्ता।मदर टेरेसा की ऐसी कारगुज़ारियों के चर्चे धीरे धीरे पूरी दुनिया में होने लगे। विश्व के अनेकों देशों का बड़े से बड़ा सम्मान मदर को मिलने लगा। और सम्मानों का ज़िक्र ही क्या करना, 1979 में विश्व का सर्वोच्च सम्मान समझा जाने वाला नोबल शांति पुरस्कार मदर को प्राप्त हुआ। इसी प्रकार मदर टेरेसा को भारत में भी यहां के सर्वोच्च सम्मानों पदमश्री, नेहरू पुरस्कार यहां तक कि 1980 में भारत के सर्वोच्च सम्मान भारत रत्न से भी सम्मानित किया गया। विश्व का शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा हो जिसे विश्व के इतने सम्मान प्राप्त हुए हों। यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि मदर ने अपने व्यक्तित्व को अपने समर्पित सेवा भाव के द्वारा इतना ऊंचा उठा दिया था कि विश्व के बड़े से बड़ा सम्मान उनके व्यक्तित्व की बुलंदी के सामने बौना लगने लगा था।ऐसा भी नहीं कि उनके विरोधी या आलोचक बिल्कुल नहीं थे। भारत में हिंदुत्ववादी राजनीति करने वाला वर्ग मदर टेरेसा का विरोधी था। इस विचारधारा के नेताओं का मानना था कि मदर टेरेसा समाज सेवा के बहाने धर्म परिवर्तन को प्रोत्साहन देती थीं। इन नेताओं का आरोप है कि मदर टेरेसा समाज सेवा की आड़ में ईसाईयत का प्रचार करती थीं तथा पीड़ित व्यक्ति की सेवा कर उसे ईसाई धर्म अपनाने हेतु प्रोत्साहित करती थीं। उनकी मृत्यु के समय जब उन्हें राजकीय सम्मान के साथ अन्तिम विदाई दी गई, उस समय भी इसी विचारधारा के संगठनों ने मदर टेरेसा को राजकीय सम्मान दिए जाने का विरोध किया था। यह वर्ग उन्हें भारत रत्न से नवांजे जाने का भी विरोधी था।बहरहाल भारत भूमि का सदियों से यह इतिहास रहा है कि इस धरती पर न सिर्फ मदर टेरेसा बल्कि उन जैसे और भी तमाम सूंफी सन्त व फकीर चाहे वे दुनिया के किसी भी कोने से क्यों न आए हों, वे यहां आकर यहीं की सोंधी मिट्टी व सर्वधर्म सम्भाव की खुशबूदार हवा में समाकर रह गए। मदर टेरेसा की आलोचना करने वालों को यह हरगिज नहीं भूलना चाहिए कि मदर टेरेसा के होम में उसी व्यक्ति को पनाह की दरकार होती थी जो अपने समाज, बिरादरी व परिवार द्वारा तिरस्कृत किया जाता था चाहे वह किसी भी धर्म या सम्प्रदाय का क्यों न हो।5 सितम्बर 1997 को नोबल शांति पुरस्कार विजेता, भारत रत्न मदर टेरेसा ने अपने करोड़ों प्रशंसकों व लाखों आश्रितों को अलविदा कहते हुए भारत के कोलकाता महानगर में अपनी अन्तिम सांस ली थी। इसमें कोई शक नहीं कि कोलकाता महानगर ही नहीं बल्कि पूरा देश इस बात के लिए स्वयं को सौभाग्यशाली महसूस करता है कि अवतार रूपी मदर टेरेसा भारतवर्ष की मिट्टी में समाकर यहां की धरती को गौरवान्वित कर रही हैं। इस महान आत्मा को शत-शत नमन।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-6039596251403717982?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/6039596251403717982/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=6039596251403717982' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/6039596251403717982'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/6039596251403717982'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/09/blog-post_02.html' title='बेसहारों का सहारा थीं मदर टेरेसा'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-9032090066693570106</id><published>2009-09-02T02:50:00.000-07:00</published><updated>2009-09-02T02:53:14.704-07:00</updated><title type='text'>मदर टेरेसा जन्मदिन व पुण्यतिथि पर विशेष</title><content type='html'>हर दुखिया के आंसू पोंछती थीं मदर&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हर दुखिया के आंखों से आंसू पोछने और हर बेघर को छत दिलाने की हसरत रखने वाली मदर टेरेसा बीसवीं शताब्दी की ऐसी महान विभूति थी जिन्होंने अपनी करूणा को किसी भौगोलिक सीमा में न बांधते हुए भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया तथा पीड़ितों की सेवा में अपना पूरा जीवन लगाकर यह साबित कर दिया कि वह सही मायने में विश्व नागरिक थीं।मदर टेरेसा ने अपने बारे में एक बार कहा था कि रक्त से मैं अल्बानियाई (जन्मस्थान) हूं। नागरिकता के अनुसार भारतीय हूं। धर्म के अनुसार मैं एक कैथोलिक नन हूं। मेरी धारणा है कि मैं पूरे विश्व की हूं और दिल से मैं पूरी तरह जीसस की हूं। मकदूनिया के स्कोपजे में 26 अगस्त 1910 को जन्मी मदर टेरेसा के सिर से पिता का साया महज आठ साल की उम्र में उठ गया था। घोर आर्थिक कष्टों के बावजूद उनकी धर्म और प्रभु में आस्था बनी रही। परियों और राजकुमार के सपने देखने वाली 12 साल की उम्र में उन्होंने नन बनने का निश्चय कर लिया। यह निश्चिय पूरा हुआ 18 साल की बालिग उम्र में, जब वह ईसाई ननों की आयरिश संस्था सिस्टर्स आफ लारेट में शामिल हुईं। इस संस्था के कुछ मिशन भारत में थे। उन्होंने डबलिन में कुछ समय तक इंस्टीट्यूट आफ ब्लेस्ड विर्जिन मैरी में प्रशिक्षण लिया।मदर टेरेसा ने अपनी कर्मभूमि भारत में पहली बार छह जनवरी 1929 को कदम रखा। उन्होंने 1931 से 1948 तक कलकत्ता के सेंट मैरी हाई स्कूल में अध्यायपन किया। स्कूल की चाहरदिवारी में रहते हुए उनका मन महानगर की मलिन बस्तियों में रहने वाले बीमार, गरीब और असहाय लोगों के लिए भटकता रहता था।मदर टेरेसा ने 1948 में पटना में चिकित्सा संबंधी एक छोटा सा प्रशिक्षण हासिल किया और इसके बाद कलकत्ता लौटकर वह पीड़ितों, रोगियों और असहाय लोगों की सेवा में जुट गयीं। दीन दुखियों की सेवा की ललक को देखते हुए वेटिकन ने उन्हें सात अक्तूबर 1950 को अपना स्वयं का आर्डर खोलने की अनुमति दे दी और इसी के साथ मिशनरीज आफ चैरिटी की शुरूआत हुई। कलकत्ता में महज 12 सदस्यों के साथ शुरू हुई संस्था आज दुनिया में एक विशाल वटवृक्ष की तरह फैल गयी है। इस संस्था की 100 से अधिक देशों में उपस्थिति है और यह 4000 से अधिक अनाथालय चलाती है।इस संस्था के तहत मदर टेरेसा ने तमाम देशों की यात्राएं कर दीन दुखियों की सेवा के अपने लक्ष्य को आगे बढ़ाया। मदर टेरेसा वास्तव में मानवता प्रेमी व्यक्तित्व थीं और यही कारण है कि ईसाई मिशनरी होने के बावजूद उनका कम्युनिस्ट शासन वाले देशों में उसी तरह सम्मान होता था जैसा कि अन्य किसी भी देश में।मिशनरीज आफ चैरिटी के लिए दिल्ली में काम करने वाली सिस्टर शोमेन ने बताया कि इस संस्था के तहत राष्ट्रीय राजधानी सहित देश के विभिन्न नगरों में बेसहारा एव असहाय लोगों, रोगियों और अनाथ बच्चों की देखभाल की जाती है। उन्होंने कहा कि तमाम आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद संस्था से जुड़े लोग मदर टेरेसा की प्रेरणा से अपने कामों को पूरे उत्साह के साथ करते हैं। सिस्टर शोमेन ने कहा कि मदर टेरेसा को संत का दर्जा मिलने के लिए एक और चमत्मकार को वेटिकन द्वारा मान्यता दिये जाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अभी तक कई लोगों ने इस तरह के चमत्कार का दावा किया है। मदर टेरेसा को तमाम राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय एवं धार्मिक पुरस्कारों से नवाजा गया। विश्व जनमत ने जहां उनकी सेवाओं को देखते हुए उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया वहीं भारत में उन्हें शीर्ष नागरिक सम्मान भारत रत्न से नवाजा गया।दीन दुखियों के प्रति उनके मन में प्यार और पूरी मानवता के प्रति उनकी करूणा को देखते हुए रोमन कैथोलिक पंथ ने उन्हें संत की पदवी देने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इस प्रक्रिया के तहत वेटिकन ने 2002 में मोनिका बेसरा नामक एक भारतीय महिला के उस अनुभव को एक चमत्कार के रूप में मान्यता प्रदान कर दी जिसके तहत मदर टेरेसा के चित्र वाला लाकेट पहनने के कारण इस महिला के पेट में कैंसर वाला ट्यूमर समाप्त हो गया।पोप जान पाल द्वितीय ने 2003 में मदर टेरेसा को ‘ ब्लेस्ड टेरेसा आफ कलकत्ता' की उपाधि प्रदान की। कैथोलिक पंथ की मान्यताओं के अनुसार उन्हें औपचारिक रूप से संत का दर्जा दिये जाने के लिए एक और चमत्कार की घटना सामने आनी चाहिए।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-9032090066693570106?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/9032090066693570106/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=9032090066693570106' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/9032090066693570106'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/9032090066693570106'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/09/blog-post.html' title='मदर टेरेसा जन्मदिन व पुण्यतिथि पर विशेष'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-7493178053721874086</id><published>2009-08-24T05:08:00.000-07:00</published><updated>2009-08-24T05:12:29.337-07:00</updated><title type='text'></title><content type='html'>गांधी जी के नक्शेकदम पर चले नेल्सन मंडेला&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की घृणित प्रथा के खात्मे के लिये चले निर्णायक आंदोलन के अगुवा नेल्सन मंडेला के जीवन में महात्मा गांधी और सुभाष चन्द्र बोस के रूप में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े अलग-अलग विचारधाराओं वाले दो पुरोधाओं की सोच का अनोखा संगम देखा जा सकता है।&lt;br /&gt;मंडेला ने महात्मा गांधी के नक्शेकदम पर चलते हुए जहां सरकार के विरुद्ध अवज्ञा आंदोलन शुरू किया वहीं भेदभाव की नीति से मुक्ति के लिये बोस की तरह सरकार के खिलाफ युद्ध का सहारा भी लिया था।&lt;br /&gt;वह अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस (एएनसी) की सशस्त्र इकाई ‘उमखोंतो वे सिजवे' के प्रमुख रहे और उन्हें देशद्रोह तथा अन्य आरोपों में करीब 17 साल जेल में गुजारने पड़े&lt;br /&gt;यह सम्भवत: गांधी जी की नीतियों का ही असर था कि मंडेला देश में रंगभेद की नीति के विरोध में खड़े हुए नई पीढ़ी के कार्यकताओं को एकजुट कर सके।&lt;br /&gt;महात्मा गांधी द्वारा दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह आंदोलन के रूप में की गई शुरुआत के वर्ष 1947 में भारत की आजादी के रूप में मंजिल तक पहुंचने से दक्षिण अफ्रीका में वांछित परिवर्तन की उम्मीद पैदा हुई। मंडेला को महात्मा गांधी द्वारा शुरू किये गए उपनिवेश विरोधी आंदोलन को सम्पन्न करने वाला नेता भी कहा जाता है।&lt;br /&gt;दक्षिण अफ्रीका में समानता और स्वतंत्रता की जंग में विजयस्वरूप देश के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बने मंडेला के योगदान को देखते हुए देश की सरकार ने इस साल से 18 जुलाई को ‘मंडेला डे' के रूप में मनाने की घोषणा की है। मंडेला ने महात्मा गांधी के पदचिन्हों पर चलकर देश के अश्वेत लोगों में नयी चेतना पैदा की, वहीं दासता के प्रतीक स्थलों तथा सरकारी भवनों पर हमले के अभियान की भी अगुवाई की। उन्हें देश में हिंसा फैलाने तथा कई अन्य गम्भीर आरोपों में पांच अगस्त 1962 को गिरफ्तार कर लिया गया। उन पर मुकदमा चला और 12 जून 1964 को उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई गई।&lt;br /&gt;मंडेला को रॉबेन द्वीप पर बनी जेल में रखा गया। आजीवन कारावास की सजा मिलने के बावजूद मंडेला का रंगभेद नीति के खिलाफ आंदोलन का जुनून कम नहीं हुआ। उन्होंने जेल में बंद अश्वेत लोगों को लामबंद करना शुरू किया। उनकी इस कोशिश की वजह से इस जेल को ‘मंडेला यूनीवर्सिटी' कहा जाने लगा।&lt;br /&gt;फरवरी 1985 में तत्कालीन राष्ट्रपति पी. डब्ल्यू. बोथा ने मंडेला को आंदोलन का रास्ता छोड़ने की कीमत पर रिहाई की पेशकश की जिसे उन्होंने ठुकरा दिया। दक्षिण अफ्रीकी सरकार पर मंडेला को मुक्त करने का अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ने पर मंडेला को 11 फरवरी 1990 को रिहा कर दिया गया। उन्हें वर्ष 1993 में नोबेल शांति पुरस्कार प्रदान किया गया&lt;br /&gt;27 अप्रैल 1994 को देश में पहली बार श्वेत और अश्वेत लोगों की भागीदारी वाले चुनाव में एएनसी की जोरदार जीत के बाद मंडेला ने 10 मई 1994 को दक्षिण अफ्रीका का पहला अश्वेत राष्ट्रपति बनने की उपलब्धि हासिल कर ली। अपना 91वां जन्मदिन मना चुके  मंडेला आज भी विभिन्न सामाजिक कायो' से जुड़े हैं।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-7493178053721874086?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/7493178053721874086/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=7493178053721874086' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/7493178053721874086'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/7493178053721874086'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/08/17-1947-18-1962-12-1964-1985.html' title=''/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-8531993833492700485</id><published>2009-08-17T03:25:00.001-07:00</published><updated>2009-08-17T03:30:59.570-07:00</updated><title type='text'>राजीव गांधी: एक युगद्रष्टा</title><content type='html'>आने वाले युग का पूर्वानुमान लगाना और उसके मुताबिक पग-पग आगे बढ़ना एक युगदृष्टा यही करता है। राजीव गांधी भी एक युगदृष्टा थे। उन्होंने अर्थव्यवस्था को जंग खाए संरक्षण की बेड़ियों से स्वतंत्र कराने और कंप्यूटर के जरिए करवट लेते संसार को साधने का सपना देखा था।&lt;br /&gt;अब तक के इस सबसे युवा प्रधानमंत्री को अपनों की सदइच्छा और गैरों की उपेक्षा मिली पर आज उन्हीं सपनों के पंख लगाकर भारत कंप्यूटर विज्ञान और आर्थिक क्षेत्र में सम्भावित पहचान बना चुका है।&lt;br /&gt;भले ही राजीव गांधी श्रीपेरंबदूर में आतंकवाद के शिकार हो गए लेकिन उनके सपनों को सच करने में उनकी पत्नी सोनिया गांधी और कांग्रेस पार्टी शिद्दत से लगे रहे। आज देश एक ओर जहां पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की 18वीं पुण्यतिथि मना रहा है वहीं 18 साल से जनाधार के मामले में हिचकोले खा रही कांग्रेस इस बार फिर चुनावी धरातल पर काफी मजबूत बनकर उभरी है।&lt;br /&gt;राजीव गांधी और कांग्रेस को लेकर 18 का अंक इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि गत 18 मई को वह शख्स भी मारा गया जिसने भारत को आर्थिक तरक्की की राह दिखाने वाले इस युवा प्रधानमंत्री की हत्या कराई थी।&lt;br /&gt;इसे संयोग कहें या कुछ और कि मई के महीने में ही राजीव गांधी की हत्या हुई और मई के महीने में ही उनकी हत्या कराने वाला लिट्टे प्रमुख वेलुपिल्लई प्रभाकरन मारा गया। राजीव गांधी जहां 1991 में 21 मई को भारत के तमिल प्रदेश में शहीद हुए वहीं उनकी जान लेने का षड्यंत्र रचने वाला प्रभाकरन उनकी 18वीं पुण्यतिथि से तीन दिन पहले 18 मई को श्रीलंका के तमिल क्षेत्र में मारा गया।&lt;br /&gt;अट्ठारह साल पहले गम देने वाला मई का महीना इस बार कांग्रेस के लिए दोहरी खुशियां लेकर आया है। एक ओर जहां आम चुनावों में उसके नेतृत्व वाले संप्रग गठबंधन को जबर्दस्त जीत मिली वहीं राजीव गांधी के हत्यारे का मारा जाना देशवासियों के साथ ही कांग्रेस के लिए भी राहत का सबब बना। राहुल गांधी का अपने पिता की तरह ही करिश्माई व्यक्तित्व वाले नेता के रूप में उभरना भी इस महीने की एक और खासियत रही। बीस अगस्त 1944 को जन्मे राजीव गांधी इंडियन एयरलाइंस में पायलट थे। अपने भाई संजय गांधी की मौत के बाद उन्होंने राजनीति में प्रवेश किया और 1981 में वह उत्तर प्रदेश के अमेठी संसदीय निर्वाचन क्षेत्र से लोकसभा के लिए चुने गए।&lt;br /&gt;31 अक्तूबर 1984 को सिख अंगरक्षकों द्वारा इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश की कमान उनके बेटे राजीव गांधी के हाथों में आ गई और इस पद पर वह दो दिसंबर 1989 तक रहे।&lt;br /&gt;राजीव गांधी की छवि एक ईमानदार नेता की थी लेकिन 1987 के मध्य में सामने आए बोफोर्स कांड ने उनकी छवि को धूमिल कर दिया जिसका नतीजा यह हुआ कि 1989 के आम चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का मुंह देखना पड़ा। राजीव गांधी के कार्यकाल में श्रीलंका में तमिल विद्रोही संगठन लिट्टे ने खूनखराबा मचा रखा था। लिट्टे को खत्म करने के लिए राजीव ने श्रीलंका में भारतीय शांति सेना भेज दी जिससे लिट्टे प्रमुख प्रभाकरन खार खा गया। शांति सेना भेजे जाने से खफा प्रभाकरन ने राजीव गांधी की हत्या की योजना बनाई जिसे उसकी महिला आत्मघाती हमलावर धनु ने अंजाम दिया।&lt;br /&gt;राजीव गांधी 21 मई 1991 को एक कांग्रेस प्रत्याशी के हक में प्रचार करने के लिए तमिलनाडु के श्रीपेरंबदूर में थे जहां लिट्टे की महिला आत्मघाती हमलावर धनु अपने शरीर से 700 ग्राम आरडीएक्स बांधकर भीड़ में राजीव गांधी के पास जा पहुंची और उनके पैर छूने के बहाने झुककर शरीर पर बंधे विस्फोटक को उड़ा दिया।&lt;br /&gt;राजीव गांधी के एकाएक चले जाने से देश में शोक की लहर दौड़ गई और लिट्टे के प्रति लोगों के मन में रोष उत्पन्न हो गया।&lt;br /&gt;राजीव गांधी की हत्या के साथ ही लिट्टे के पतन की शुरुआत हो गई थी। श्रीलंका भेजी गई भारतीय शांति सेना में शामिल रहे कर्नल आरके चौधरी का कहना है कि विश्वनाथ प्रताप सिंह सरकार ने शांति सेना को वापस बुला लिया था नहीं तो भारत के सैनिक लिट्टे को कुचलकर ही देश लौटते। इस अभियान में भारत के 1100 सैनिक शहीद हो गए और दो हजार करोड़ रुपया खर्च हुआ। चौधरी का कहना है कि राजीव गांधी की हत्या के चलते लिट्टे के प्रति सहानुभूति रखने वालों के दिलों में भी उसके लिए जगह नहीं रही और बाद में लिट्टे के प्रवक्ता ने इस कृत्य को संगठन की एक गलती माना।&lt;br /&gt;इस हत्याकांड में वांछित लोगों की भारत की सूची में प्रभाकरन का नाम शीर्ष पर था उसे पकड़ने की लाख कोशिशों के बावजूद वह काबू नहीं आया।&lt;br /&gt;इस घटना के 18 साल बाद 18 मई को ऐसा मौका आया जब प्रभाकरन श्रीलंकाई सेना के हाथों मारा गया और समूचे लिट्टे का खात्मा हो गया। आत्मघाती हमलों तथा साइनाइड खाकर जान देने के लिए कुख्यात रहे लिट्टे के लड़ाके अंतिम समय में बेहद कमजोर पड़ गए।&lt;br /&gt;लिट्टे के खात्मे से देश की जनता और कांग्रेस को भले ही राहत मिली हो लेकिन उसके हाथों मारे गए देश के एक युवा नेता की हत्या का दर्द आने वाली कई पीढ़ियों को सालता रहेगा। राजीव के पुत्र के रूप में राहुल ने देश की युवाशक्ति के साथ देश को संवारने का बीड़ा उठाया और अपने पिता के सपनों को नये पंख और नयी परवाज दी।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-8531993833492700485?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/8531993833492700485/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=8531993833492700485' title='5 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/8531993833492700485'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/8531993833492700485'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/08/blog-post_6840.html' title='राजीव गांधी: एक युगद्रष्टा'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>5</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-3696224362974063612</id><published>2009-08-17T03:18:00.000-07:00</published><updated>2009-08-17T03:19:27.993-07:00</updated><title type='text'>'वज्रपात'</title><content type='html'>इंदिरा गाँधी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;( 1 नवंबर 1984 को लिखे गए नईदुनिया के सम्पादकीय 'वज्रपात' से)   &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जन्म : 19 नवम्बर, 1917….&lt;br /&gt;मृत्यु : 31 अक्टूबर, 1984….&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'भारत रत्न' (1972), राष्ट्र की पहली महिला प्रधानमंत्री और नागपुर कांग्रेस अधिवेशन (1959) में अध्यक्ष चुनी गईं इंदिरा प्रियदर्शिनी गांधी का जन्म आनंद भवन, इलाहाबाद में हुआ। कांग्रेस के सौ वर्ष के इतिहास के दौरान कांग्रेस अध्यक्ष पद को सुशोभित करने वाली इंदिराजी चौथी महिला थीं। उनके पूर्व ऐनी बेसेंट (1917), सरोजिनी नायडू (1925) और नेली सेनगुप्त (1933) इस पद को सुशोभित कर चुकी थीं। वे 1978 व 83 में कांग्रेस अध्यक्ष रहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिता जवाहरलालजी के सान्निध्य में इंदिरा गांधी को व्यावहारिक राजनीतिक दीक्षा स्वाभाविक रूप से प्राप्त हुई। शांति निकेतन और ऑक्सफोर्ड में पढ़ाई कर 1931 से वे स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय हुईं। सविनय अवज्ञा आंदोलन के दौरान बारह वर्षीय इंदिराजी ने वानर सेना का गठन किया। 1942 के 'भारत छोड़ो' आंदोलन में पति फिरोज गांधी के साथ 13 माह तक वे नैनी जेल में रहीं। आजादी के बाद के साम्प्रदायिक दंगों में गांधीजी के निर्देशन में शांति स्थापना का साहसिक काम किया।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने 1964 से 66 तक केन्द्रीय प्रसारण मंत्रालय का काम देखा। 24 जनवरी, 1966 को इंदिरा गांधी गणतन्त्र की चौथी प्रधानमंत्री बनीं। वे मार्च 1977 तक इस पद पर रहीं। जनता पार्टी के शासन को छोड़कर जनवरी, 1980 से उनकी शहादत तक (31 अक्टूबर, 84) वे प्रधानमंत्री रहीं।&lt;br /&gt;विश्व में भारत की उत्तम छबि की स्थापना में उन्होंने भरसक योग दिया और तटस्थ राष्ट्रों का नेतृत्व व मार्गदर्शन किया। स्वयं के दिए गए नारे 'गरीबी हटाओ' को उन्होंने ईमानदारी से कार्यान्वित करने की कोशिश की। सम्पूर्ण राष्ट्र उनकी पुण्यतिथि (31 अक्टूबर) 'एकता और अखंडता दिवस' के रूप में मानता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'भारत की छबि को हमेशा उज्ज्वल करना और गरीबों और निचले तबके को ऊपर उठाने के मकसद से सही दिशा में आगे ले जाना हमारा मूल उद्देश्य होना चाहिए।' -नई दिल्ली कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्षीय भाषण से।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'इंदिरा गांधी के चले जाने से देश का राजनीतिक परिदृश्य बदले बिना नहीं रहेगा। सबसे बड़ी ठेस स्वयं इंदिरा कांग्रेस को लगेगी। पिछले दो दशकों में जो चुनाव कांग्रेस ने जीते, वे सिर्फ इंदिरा के जादू के बल पर। सत्तर में जब ये जादू कुछ समय के लिए लुप्त हो गया तो राज्यों और केन्द्र में कांग्रेस ने भारी मार खाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सवाल यह है कि इतने दिनों तक इंदिरा गांधी के कंधों पर बैठकर विजय यात्रा करने की आदी कांग्रेस क्या अब अपने पैरों पर खड़ी हो पाएगी? -इंदिराजी की हत्या के बाद 1 नवंबर 1984 को लिखे गए नईदुनिया के सम्पादकीय 'वज्रपात' से। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;---------------------------------------------&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-3696224362974063612?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/3696224362974063612/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=3696224362974063612' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/3696224362974063612'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/3696224362974063612'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/08/blog-post_156.html' title='&apos;वज्रपात&apos;'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-4438035186941922920</id><published>2009-08-17T02:28:00.000-07:00</published><updated>2009-08-17T02:29:20.097-07:00</updated><title type='text'>रोबोट ………</title><content type='html'>&lt;a href="http://hindijokes.blogspot.com/2007/07/blog-post.html"&gt;रोबोट&lt;/a&gt; ………&lt;br /&gt;एक दिन राजू के पापा एक रोबोट ले कर आये…………..वह रोबोट झूठ पकड़ सकता था और झूठ बोलने वाले को गाल पर खीँच कर चांटा मार देता था……………..आज राजू स्कूल से घर देर से आया था............. पापा ने पूछा "घर लौटने में देर क्यो हो गयी?"…………"आज हमारी एक्स्ट्रा क्लासेस थी" राजू ने जवाब दिया...रोबोट अचानक अपनी जगह से उछला और जमकर राजू के गाल पर चांटा मार दिया…………पापा हंसकर बोले, "ये रोबोट हर झूठ को पकड़ सकता है और झूठ बोलने वाले को चांटा भी मारता है. अब सच क्या है यह बताओ... कहाँ गए थे?"…………"में फिल्म देखने गया था" राजू बोला……….."कौन सी फिल्म?" पापा ने कड़ककर पूछा……………"हनुमान"………..चटाक... अभी राजू की बात पूरी भी नहीं हुई थी की उसके गाल पर रोबोट ने एक जोर का चांटा मारा…………"कौन सी फिल्म?" पापा ने फिर पूछा……….."कातिल जवानी."……….पापा ग़ुस्से में बोले "शर्म आनी चाहिए तुम्हे. जब में तुम्हारे जितना था तब ऐसी हरकत नहीं किया करता था."……..चटाक... रोबोट ने एक चांटा मारा... इस बार पापा के गाल पर……….यह सुनते ही मम्मी किचन में से आते हुए बोली "आख़िर तुम्हारा बेटा है ना... झूठ तो बोलेगा ही"…………अब मम्मी की बारी थी... चटाक...&lt;br /&gt;……………………….&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-4438035186941922920?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/4438035186941922920/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=4438035186941922920' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/4438035186941922920'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/4438035186941922920'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/08/blog-post_3447.html' title='रोबोट ………'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-2009366088379362080</id><published>2009-08-17T02:22:00.000-07:00</published><updated>2009-08-17T02:23:58.553-07:00</updated><title type='text'>लगे रहो चमन भाई</title><content type='html'>&lt;a href="http://hindijokes.blogspot.com/2007/07/blog-post_02.html"&gt;लगे रहो चमन भाई&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://hindijokes.blogspot.com/2006/02/blog-post_10.html"&gt;चमन भाई&lt;/a&gt; को पता चला की उसके एकाउंटेंट ने उसे ५० करोड़ का चुना लगाया है……एकाउंटेंट गूंगा और बहरा था. उसे नौकरी पर इसलिये लगाया था की बहरा होने के कारण कभी कोई राज़ की बात सुन नहीं सकेगा, और गूंगा होने के कारण कभी कोर्ट में उसके खिलाफ गवाही नहीं दे सकेगा……चमन भाई को गूंगे-बहारो के इशारो की समझ नहीं थी इसलिये पूछताछ के लिए अपने दाहिने हाथ "सटकेला" को ले गया जिसे इशारो की समझ थी……चमन भाई ने एकाउंटेंट से पूछा "बता तुने जो मेरे ५० करोड़ उडाये है वो कहाँ छुपा रखे है?"सटकेला ने इशारो में एकाउंटेंट से पुछा उसने पैसे कहाँ छुपाये…..एकाउंटेंट ने इशारे में कहाँ : "मैं कुछ नहीं जानता तुम किं पैसो की बात कर रहे हो"सटकेला ने चमन भाई से कहा: "भाई बोल रहा वो कुछ नहीं जानता हम किं पैसो की बात कर रहे है."चमन भाई को गुस्सा आ गया और पिस्तौल एकाउंटेंट की कनपट्टी पर रखकर बोला "अब फिर पूछ!"सटकेला ने इशारों में एकाउंटेंट को कहा: "तुने अगर नहीं बताया और भाई ने घोडा दबा दिया तो समझ ले तेरी वाट लग जायेगी!"एकाउंटेंट ने डरकर इशारे किये: "अच्छा! में बताता हूँ! मैंने पैसे मेरे चचेरे भाई संतु के घर के पिछवाड़े में गाड़ दिए थे!"चमन भाई ने पूछा: "क्या बोलता है सटकेला?"सटकेला ने जवाब दिया: "भाई... बोलता है... की आपमें हिम्मत नहीं की उसे गोली मार सके!!"&lt;br /&gt;………………………………..&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-2009366088379362080?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/2009366088379362080/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=2009366088379362080' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/2009366088379362080'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/2009366088379362080'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/08/blog-post_17.html' title='लगे रहो चमन भाई'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-691453679385286351</id><published>2009-08-17T01:50:00.000-07:00</published><updated>2009-08-17T02:21:25.393-07:00</updated><title type='text'>कुछ चुटकुले</title><content type='html'>&lt;a href="http://hindijokes.blogspot.com/2006/02/blog-post_10.html"&gt;चमन भाई का एरिया है लफ़ड़ा नहीं...&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;﻿एक एरिया में भाई रहता है, चमन भाई॥ अब उसके एरिया में जो भी लफ़ड़ा होता है तो पुलिस से पहले चमन भाई की अदालत में जाता है।&lt;br /&gt;एक बार चमन भाई के एरिया में रेप हो जाता है और जिस ने काम बजाया होता है उसको पकड़ के चमन भाई के पास लेके जाते है।&lt;br /&gt;चमन भाई पहले तो बहुत शान्ति से स्टाईल में उससे बात करते है वो कुछ इस तरह से है।&lt;br /&gt;चमन: क्या रे तेरे को मालूम नहीं ये अपुन का एरिया है??&lt;br /&gt;मुजरीम: हाँ मालूम है ना भाई।&lt;br /&gt;चमन: फ़िर कैसे हिम्मत किया रेप की मेरे एरिया मे?&lt;br /&gt;मुजरीम: अब क्या बोलु भाई किस्मत खराब थी।&lt;br /&gt;चमन: चल मेरे को सब सच सच बता क्या और कैसे हुआ&lt;br /&gt;मुजारीम: अभी क्या ना इधर नाके पे अपुन पान खाने के लिये आया&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;चामन: फ़िर॥&lt;br /&gt;मुर्जिम: अपुन खड़े होके पान खारेला था और उतने में सामने वाली बिल्डींग पे अपुन की नज़र गई।&lt;br /&gt;चमन: आगे बोल,&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;मुजरीम: उधर तीसरी माले पे एक चिकनी खड़ी हुए थी,&lt;br /&gt;चमन: फ़िर क्या हुआ,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;मुजरीम: अपुन को ऐसा लगा के उसने इशारा किया आने के लिए,&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;चमन: फ़िर तुने क्या किया,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;मुजरीम: अपुन सोचा के कुछ काम होएंगा उसको। अपुन बिल्डींग के नीचे गया,&lt;br /&gt;चमन: फिर,:&lt;br /&gt;मुजरीम, उसने इशारे से अपुन को उपर बोलाया॥ अपुन सिड़ी चड़ते हुए सोच रहा था चमन भाई का एरिया है लफ़ड़ा नहीं करने का,&lt;br /&gt;चमन: चल फ़टा फ़ट आगे बोल,  &lt;br /&gt; मुजरीम. ने उसको जाके बोला क्या काम है? काईको इशारा किया अपुन को?&lt;br /&gt;चमन: फिर,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;  मुजरीम &lt;/span&gt;: फ़िर क्या भाई अपुन को उसने घर में अन्दर खींच बिया,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;चमन: फिर,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;मुजरीम: अपुन घर में तो चला गया लेकिन सोच रहा था के चमन भाई का एरिया है लफ़ड़ा नहीं करने का,&lt;br /&gt;चमन: आगे बोल,&lt;br /&gt;मुजरीम: उसने अपुन का हाथ पकड़ लिया,&lt;br /&gt;चमन: अच्छा?&lt;br /&gt;मुजरीम: सच्छी बोलता है भाई हाथ पकड़ते ही अपुन फ़िर सोचा चमन भाई का एरिया है लफ़ड़ा नहीं करने का&lt;br /&gt;चमन: फ़िर क्या हुआ,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;मुजरीम: फ़िर क्या था उसने बोला चिकने मेरी प्यास बुझा दे,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;चमन: फ़िर तु क्या बोला (जोश में आकर)&lt;br /&gt;मुजरीम: अपुन क्या बोलता? उसने अपना दुपट्टा नीचे गिरा दिया,&lt;br /&gt;चमन: तो क्या हुआ,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;मुजरीम: अपुन के दिमाग की दही हो गई.... क्या बॉडी थी साली की... लेकिन भाई फ़िर भी अपुन सोचा चमन भाई का एरिया है लफ़ड़ा नहीं करने का,&lt;br /&gt;चमन: फ़िर तुने क्या किया,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;मुजरीम: अपुन बोला एकाद किस करेगा और चला जायेगा। बोले तो बॉडी काम करेंगा लेकिन इन्जन नहीं खोलने का,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;चमन: तो फिर,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;मुजरीम: उसने अपुन को खीच लिया सच्ची बोला है भाई ऐसी कातिल जवानी अपुन अक्खी लाइफ़ में नहीं देखा,&lt;br /&gt;चमन-हाँ वो तो है तो आगे बोल (गर्म होते हुए)&lt;br /&gt;मुजरीम: फ़िर क्या था अपुन ने किस किया, लेकिन इमान से बोलता है सोच रहा था चमन भाई का एरिया है लफ़ड़ा नहीं करने का,&lt;br /&gt;चमन : आगे बोल,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;मुजरीम: फ़िर उसने अपनी कमीज़ उतार दी,&lt;br /&gt;चमन: फिर,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;मुजरीम : फ़िर सलवार। लेकिन अपुन के दिल में एक ही खयाल आ रहा था चमन भाई का एरिया है लफ़ड़ा नहीं करने का,&lt;br /&gt;चमन: आगे &lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;मुजरीम: फ़िर बिलाउस और चड्डी साली ने सब उतार दी,&lt;br /&gt;चमन: सही में। फिर,&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;मुजरीम: फ़िर मेरी पेन्ट खींच ली,&lt;br /&gt;चमन : अच्छा। फ़िर .............&lt;br /&gt;&lt;span class=""&gt;&lt;/span&gt;मुजरीम: मेरी अंडरवीयर में हाथ डाल दिया....&lt;br /&gt;चमन: ओह! फ़िर, फ़िर,&lt;br /&gt;मुजरीम: चड्डी उतार दी मेरी लेकिन अपुन फ़िर भी सोचा चमन भाई का एरिया है लफ़ड़ा नहीं करने&lt;br /&gt;चमन: (गुस्सा होते हुए) अरे चमन गया माँ चुदाने तु आगे बोल।&lt;br /&gt;मुजरीम : यही सोच के तो मैने रेप कर डाला.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-691453679385286351?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/691453679385286351/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=691453679385286351' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/691453679385286351'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/691453679385286351'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/08/blog-post.html' title='कुछ चुटकुले'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-2817777699114636743</id><published>2009-03-25T05:11:00.000-07:00</published><updated>2009-03-25T05:14:55.865-07:00</updated><title type='text'>गीता की सीख लो तब बनो गांधी</title><content type='html'>चचेरे भाई वरुण गांधी के पीलीभीत में दिए भड़काऊ भाषण पर प्रतिक्रिया जताते हुए प्रियंका गांधी ने उन्हें सलाह दी है कि वह 'गीता को ठीक से पढ़ें।'रायबरेली में एक कार्यकर्ता सम्मेलन में हिस्सा लेने आई प्रियंका गांधी ने कहा "मैं उन्हें सलाह दूंगी कि वह गीता को ठीक से पढ़ें और उसे समझने की कोशिश करें।"वरुण के भाषण पर अफसोस जाहिर करते हुए प्रियंका ने कहा कि उनका बयान गांधी परिवार के सिद्धांतों के खिलाफ है। वरुण के इस बयान से उनरा पूरा परिवार दुखी है।गौरतलब है कि बीजेपी के उत्तर प्रदेश की पीलीभीत सीट से लोकसभा प्रत्याशी वरुण गांधी ने पिछले दिनों एक चुनावी सभा में समुदाय विशेष को केंद्र में रखकर बेहद भड़काऊ भाषण दिया था जिसके बाद से वह विवादों में हैं। चुनाव आयोग ने वरुण को चुनावी आचार संहिता का उल्लंघन करने का दोषी ठहराते हुए बीजेपी से कहा है कि वह उनकी उम्मीदवारी वापस ले लें।आयोग की ओर से देर शाम जारी एक आधिकारिक बयान में कहा गया कि चुनाव आयोग की राय में वरुण गांधी वर्तमान लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी बनने की योग्यता नहीं रखते।आयोग ने कहा- वरुण गांधी द्वारा दिए गए दो भाषणों में अति आपत्तिजनक संदर्भ शामिल हैं। उसमें एक खास समुदाय के खिलाफ पूरी तरह से अस्वीकार्य प्रकृति की अति उत्तेजक भाषा का इस्तेमाल किया गया है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-2817777699114636743?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/2817777699114636743/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=2817777699114636743' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/2817777699114636743'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/2817777699114636743'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/03/blog-post_25.html' title='गीता की सीख लो तब बनो गांधी'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-4096062681525150526</id><published>2009-03-25T05:06:00.000-07:00</published><updated>2009-03-25T05:11:04.014-07:00</updated><title type='text'>ये कैसा गांधी?</title><content type='html'>माफी नहीं मांगूंगा: वरुण गांधी &lt;a onclick="return openPopup(this.href,'Image','picPopup');" href="http://www.dw-world.de/popups/popup_lupe/0,,4108152,00.html" target="_blank" minmax_bound="true"&gt; &lt;/a&gt;&lt;br /&gt;सांप्रदायिक बयान के आरोपों से विवादों में आए बीजेपी के युवा नेता और इंदिरा गांधी के पोते वरुण गांधी ने माफी मांगने से इनकार किया है. कांग्रेस का कहना है कि बीजेपी को वरुण गांधी के ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी ही होगी. &lt;br /&gt;बीजेपी वरुण गांधी से कह चुकी है कि उन्हें अपने बयानों के लिए माफी मांगनी होगी. लेकिन, बुधवार को वरुण गांधी ने कहा है कि "उन्हें हिंदू होने का गर्व है, इसके लिए उन्हें किसी से माफी मांगने की ज़रुरत नहीं है." वरुण गांधी पर आरोप है कि उन्होंने पीलीभीत में एक रैली में अल्पसंख्यक समुदाय के ख़िलाफ़ भड़काऊ भाषण दिया.&lt;br /&gt;वरुण गांधी आरोपों से इनकार कर रहे हैं. वरुण के मुताबिक़ उनकी रैली की बनाई गई सीडी से छेड़छाड़ की गई है. वरुण गांधी के ख़िलाफ़ निर्वाचन आयोग ने मुक़दमा दर्ज करवाया है, जिसकी जांच उत्तर प्रदेश की पुलिस कर रही है.&lt;br /&gt;29 साल के वरुण गांधी पीलीभीत संसदीय क्षेत्र से बीजेपी के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं. लेकिन, अभी वह अपनी ही पार्टी बीजेपी और दूसरी राजनीतिक पार्टियों के निशाने पर हैं. वरुण गांधी कहते हैं, मैं राजनीतिक साजिश का शिकार हुआ हूं. सीडी में मेरे शब्द और मेरी आवाज़ नहीं हैं. मैंने कोई सांप्रदायिक बयान नहीं दिया है."&lt;br /&gt;इस बीच कांग्रेस ने एक बार फिर बीजेपी और वरुण गांधी को आड़े हाथों लिया है. बुधवार को केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने कहा, " बीजेपी को वरुण गांधी के ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी ही होगी, अगर बीजेपी ऐसा नहीं करती है, तो माना जाएगा कि वरुण के बयानों के पीछे बीजेपी की कोई योजना है."&lt;br /&gt;चुनाव से ठीक पहले वरुण गांधी ने बीजेपी और उसके घटक दलों के सामने एक नई मुसीबत खड़ी कर दी है. एक ऐसी मुसीबत, जिसमें वरुण गांधी भी अकेले हैं और उनकी पार्टी भी.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-4096062681525150526?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/4096062681525150526/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=4096062681525150526' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/4096062681525150526'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/4096062681525150526'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2009/03/blog-post.html' title='ये कैसा गांधी?'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-2785927137140789010</id><published>2008-09-26T01:43:00.000-07:00</published><updated>2008-09-26T01:45:26.817-07:00</updated><title type='text'>गांधी उवाच.............</title><content type='html'>वे ईसाई हैं, इससे क्या हिन्दुस्तानी नहीं रहे ? और परदेशी बन गये ?&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कितने ही नवयुवक शुरु में निर्दोष होते हुए भी झूठी शरम के कारण बुराई में फँस जाते होगे ।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उस आस्था का कोई मूल्य नहीं जिसे आचरण में न लाया जा सके।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अहिंसा एक विज्ञान है। विज्ञान के शब्दकोश में 'असफलता' का कोई स्थान नहीं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सार्थक कला रचनाकार की प्रसन्नता, समाधान और पवित्रता की गवाह होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक सच्चे कलाकार के लिए सिर्फ वही चेहरा सुंदर होता है जो बाहरी दिखावे से परे, आत्मा की सुंदरता से चमकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मनुष्य अक्सर सत्य का सौंदर्य देखने में असफल रहता है, सामान्य व्यक्ति इससे दूर भागता है और इसमें निहित सौंदर्य के प्रति अंधा बना रहता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चरित्र और शैक्षणिक सुविधाएँ ही वह पूँजी है जो मातापिता अपने संतान में समान रूप से स्थानांतरित कर सकते हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;विश्व के सारे महान धर्म मानवजाति की समानता, भाईचारे और सहिष्णुता का संदेश देते हैं।&lt;br /&gt;अधिकारों की प्राप्ति का मूल स्रोत कर्तव्य है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच्ची अहिंसा मृत्युशैया पर भी मुस्कराती रहेगी। 'अहिंसा' ही वह एकमात्र शक्ति है जिससे हम शत्रु को अपना मित्र बना सकते हैं और उसके प्रेमपात्र बन सकते हैं-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधभूखे राष्ट्र के पास न कोई धर्म, न कोई कला और न ही कोई संगठन हो सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नि :शस्त्र अहिंसा की शक्ति किसी भी परिस्थिति में सशस्त्र शक्ति से सर्वश्रेष्ठ होगी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आत्मरक्षा हेतु मारने की शक्ति से बढ़कर मरने की हिम्मत होनी चाहिए।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जब भी मैं सूर्यास्त की अद्भुत लालिमा और चंद्रमा के सौंदर्य को निहारता हूँ तो मेरा हृदय सृजनकर्ता के प्रति श्रद्धा से भर उठता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वीरतापूर्वक सम्मान के साथ मरने की कला के लिए किसी विशेष प्रशिक्षण की आवश्यकता नहीं होती। उसके लिए परमात्मा में जीवंत श्रद्धा काफी है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्रूरता का उत्तर क्रूरता से देने का अर्थ अपने नैतिक व बौद्धिक पतन को स्वीकार करना है।&lt;br /&gt;एकमात्र वस्तु जो हमें पशु से भिन्न करती है वह है सही और गलत के मध्य भेद करने की क्षमता जो हम सभी में समान रूप से विद्यमान है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आपकी समस्त विद्वत्ता, आपका शेक्सपियर और वडर्सवर्थ का संपूर्ण अध्ययन निरर्थक है यदि आप अपने चरित्र का निर्माण व विचारों क्रियाओं में सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वक्ता के विकास और चरित्र का वास्तविक प्रतिबिंब 'भाषा' है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;स्वच्छता, पवित्रता और आत्म-सम्मान से जीने के लिए धन की आवश्यकता नहीं होती।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्मल चरित्र एवं आत्मिक पवित्रता वाला व्यक्तित्व सहजता से लोगों का विश्वास अर्जित करता है और स्वत : अपने आस पास के वातावरण को शुद्ध कर देता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जीवन में स्थिरता, शांति और विश्वसनीयता की स्थापना का एकमात्र साधन भक्ति है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सुखद जीवन का भेद त्याग पर आधारित है। त्याग ही जीवन है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अधिकार-प्राप्ति का उचित माध्यम कर्तव्यों का निर्वाह है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उफनते तूफान को मात देना है तो अधिक जोखिम उठाते हुए हमें पूरी शक्ति के साथ आगे बढना होगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रोम का पतन उसका विनाश होने से बहुत पहले ही हो चुका था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गुलाब को उपदेश देने की आवश्यकता नहीं होती। वह तो केवल अपनी खुशबू बिखेरता है। उसकी खुशबू ही उसका संदेश है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जहां तक मेरी दृष्टि जाती है मैं देखता हूं कि परमाणु शक्ति ने सदियों से मानवता को संजोये रखने वाली कोमल भावना को नष्ट कर दिया है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरे विचारानुसार गीता का उद्देश्य आत्म-ज्ञान की प्राप्ति का सर्वोत्तम मार्ग बताना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गीता में उल्लिखित भक्ति, कर्म और प्रेम के मार्ग में मानव द्वारा मानव के तिरस्कार के लिए कोई स्थान नहीं है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं यह अनुभव करता हूं कि गीता हमें यह सिखाती है कि हम जिसका पालन अपने दैनिक जीवन में नहीं करते हैं, उसे धर्म नहीं कहा जा सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हजारों लोगों द्वारा कुछ सैकडों की हत्या करना बहादुरी नहीं है। यह कायरता से भी बदतर है। यह किसी भी राष्ट्रवाद और धर्म के विरुद्ध है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साहस कोई शारीरिक विशेषता न होकर आत्मिक विशेषता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संपूर्ण विश्व का इतिहास उन व्यक्तियों के उदाहरणों से भरा पडा है जो अपने आत्म-विश्वास, साहस तथा दृढता की शक्ति से नेतृत्व के शिखर पर पहुंचे हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हृदय में क्रोध, लालसा व इसी तरह की -----भावनाओं को रखना, सच्ची अस्पृश्यता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मेरी अस्पृश्यता के विरोध की लडाई, मानवता में छिपी अशुद्धता से लडाई है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच्चा व्यक्तित्व अकेले ही सत्य तक पहुंच सकता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;शांति का मार्ग ही सत्य का मार्ग है। शांति की अपेक्षा सत्य अत्यधिक महत्वपूर्ण है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-2785927137140789010?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/2785927137140789010/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=2785927137140789010' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/2785927137140789010'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/2785927137140789010'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2008/09/blog-post.html' title='गांधी उवाच.............'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-2706312261635783820</id><published>2008-08-18T02:29:00.000-07:00</published><updated>2008-08-18T02:30:30.738-07:00</updated><title type='text'>मुंशी प्रेमचंद भी मेरे आदर्श</title><content type='html'>मैंने दो लोगों को अपना आदर्श माना है, एक गांधी जी और दूसरे प्रेमचंद। तो मुंशी प्रेमचंद के बारे में .................&lt;br /&gt;प्रेमचंद की भाषा सरल और सजीव और व्यावहारिक है। उसे साधारण पढ़े-लिखे लोग भी समझ लेते हैं। उसमें आवश्यकतानुसार अंग्रेज़ी, उर्दू, फारसी आदि के शब्दों का भी प्रयोग है। प्रेमचंद की भाषा भावों और विचारों के अनुकूल है। गंभीर भावों को व्यक्त करने में गंभीर भाषा और सरल भावों को व्यक्त करने में सरल भाषा को अपनाया गया है। इस कारण भाषा में स्वाभाविक उतार-चढ़ाव आ गया है। प्रेमचंद जी की भाषा पात्रों के अनुकूल है। उनके हिंदू पात्र हिंदी और मुस्लिम पात्र उर्दू बोलते हैं। इसी प्रकार ग्रामीण पात्रों की भाषा ग्रामीण है। और शिक्षितों की भाषा शुद्ध और परिष्कृत भाषा है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेमचंद ने हिंदी और उर्दू दोनों की शैलियों को मिला दिया है। उनकी शैली में जो चुलबुलापन और निखार है वह उर्दू के कारण ही है। प्रेमचंद की शैली की दूसरी विशेषता सरलता और सजीवता है। प्रेमचंद का हिंदी और उर्दू दोनों पर अधिकार था, अतः वे भावों को व्यक्त करने के लिए बड़े सरल और सजीव शब्द ढूँढ़ लेते थे। उनकी शैली में अलंकारिकता का भी गुण विद्यमान है। उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों के द्वारा शैली में विशेष लालित्य आ गया है। इस प्रकार की अलंकारिक शैली का परिचय देते हुए वे लिखत हैं- 'अरब की भारी तलवार ईसाई की हल्की कटार के सामने शिथिल हो गई। एक सर्प के भाँति फन से चोट करती थी, दुसरी नागिन की भाँति उड़ती थी। एक लहरों की भाँति लपकती थी दूसरी जल की मछलियों की भाँति चमकती थी।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चित्रोपमता भी प्रेमचंद की शैली में खूब मिलती है। प्रेमचंद भाव घटना अथवा पात्र का ऐसे ढंग से वर्णन करते हैं कि सारा दृश्य आँखों के सम्मुख नाच उठता है उसका एक चित्र-सा खिंच जाता है। रंगभूमि उपन्यास के सूरदास की झोपड़ी का दृश्य बहुत सजीव है-&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;'कैसा नैराश्यपूर्ण दृश्य था। न खाट न बिस्तर, न बर्तन न भांडे। एक कोने में एक मिट्टी का घड़ा जिसको आयु का अनुमान उस पर जमी हुई काई से हो सकता था। चूल्हे के पास हांडी थी। एक पुरानी चलनी की भाँति छिद्रों से भरा हुआ तवा और एक छोटी-सी कठौत और एक लोटा। बस यही उस घर की संपत्ति थी।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;प्रेमचंद के पात्रों के उत्तर-प्रत्युत्तर उनकी शैली में अभिनयात्मकता का गुण भी समावेश कर देते हैं। उनकी शैली में हास्य-व्यंग्य का भी पुट रहता है, किंतु उनका व्यंग्य ऐसा नहीं होता जो किसा का दिल दुखाए। उसमें एक ऐसी मिठास रहती है जो मनोरंजन के साथ-साथ हमारी आँखें भी खोल देती हैं। एक उदाहरण प्रस्तुत है- 'वह गाँव में पुण्यात्मा मशहूर थे। पूर्णमासी को नित्य सत्यनारायण की कथा सुनते पर पटवारी होने के नाते खेत बेगार में जुतवाते थे, सिंचाई बेगार में करवाते थे और आसामियों को एक दूसरे से लड़वा कर रकमें मारते थे। सारा गाँव उनसे काँपता था। परमार्थी थे। बुखार के दिनों में सरकारी कुनैन बाँट कर यश कमाते थे।'&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मुहावरों और सूक्तियों का प्रयोग करने में प्रेमचंद जी बड़े कुशल थे। उन्होंने शहरी और ग्रामीण दोनों ही प्रकार के मुहावरों का खूब प्रयोग किया है। प्रेमचंद की सी मुहावरेदार शैली कदाचित ही किसी हिंदी लेखक की हो। क्षमा कहानी में प्रयुक्त एक सूक्ति देखें-'जिसको तलवार का आश्रय लेना पड़े वह सत्य ही नहीं है।' प्रेमचंद जी की शैली पर उनके व्यक्तित्व की छाप स्पष्ट रूप से अंकित है।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-2706312261635783820?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/2706312261635783820/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=2706312261635783820' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/2706312261635783820'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/2706312261635783820'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2008/08/blog-post_9629.html' title='मुंशी प्रेमचंद भी मेरे आदर्श'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-7837438041625587595</id><published>2008-08-18T02:26:00.000-07:00</published><updated>2008-08-18T02:28:49.243-07:00</updated><title type='text'>एक पहलू यह भी.....................</title><content type='html'>गत 30 जनवरी को महात्मा गाँधी के अन्तिम ज्ञात (?) अस्थि कलश का विसर्जन किया गया। यह “अंतिम ज्ञात” शब्द कई लोगों को आश्चर्यजनक लगेगा, क्योंकि मानद राष्ट्रपिता के कितने अस्थि-कलश थे या हैं, यह अभी तक सरकार को नहीं पता। कहा जाता है कि एक और अस्थि-कलश बाकी है, जो कनाडा में पाया जाता है। बहरहाल, अस्थि-कलश का विसर्जन बड़े ही समारोहपूर्वक कर दिया गया, लेकिन इस सारे तामझाम के दौरान एक बात और याद आई कि पूना में नाथूराम गोड़से का अस्थि-कलश अभी भी रखा हुआ है, उनकी अन्तिम इच्छा पूरी होने के इन्तजार में।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फ़ाँसी दिये जाने से कुछ ही मिनट पहले नाथूराम गोड़से ने अपने भाई दत्तात्रय को हिदायत देते हुए कहा था, कि “मेरी अस्थियाँ पवित्र सिन्धु नदी में ही उस दिन प्रवाहित करना जब सिन्धु नदी एक स्वतन्त्र नदी के रूप में भारत के झंडे तले बहने लगे, भले ही इसमें कितने भी वर्ष लग जायें, कितनी ही पीढ़ियाँ जन्म लें, लेकिन तब तक मेरी अस्थियाँ विसर्जित न करना…”। नाथूराम गोड़से और नारायण आपटे के अन्तिम संस्कार के बाद उनकी राख उनके परिवार वालों को नहीं सौंपी गई थी। जेल अधिकारियों ने अस्थियों और राख से भरा मटका रेल्वे पुल के उपर से घग्गर नदी में फ़ेंक दिया था। दोपहर बाद में उन्हीं जेल कर्मचारियों में से किसी ने बाजार में जाकर यह बात एक दुकानदार को बताई, उस दुकानदार ने तत्काल यह खबर एक स्थानीय हिन्दू महासभा कार्यकर्ता इन्द्रसेन शर्मा तक पहुँचाई। इन्द्रसेन उस वक्त “द ट्रिब्यून” के कर्मचारी भी थे। शर्मा ने तत्काल दो महासभाईयों को साथ लिया और दुकानदार द्वारा बताई जगह पर पहुँचे। उन दिनों नदी में उस जगह सिर्फ़ छ्ह इंच गहरा ही पानी था, उन्होंने वह मटका वहाँ से सुरक्षित निकालकर स्थानीय कॉलेज के एक प्रोफ़ेसर ओमप्रकाश कोहल को सौंप दिया, जिन्होंने आगे उसे डॉ एलवी परांजपे को नाशिक ले जाकर सुपुर्द किया। उसके पश्चात वह अस्थि-कलश 1965 में नाथूराम गोड़से के छोटे भाई गोपाल गोड़से तक पहुँचा दिया गया, जब वे जेल से रिहा हुए। फ़िलहाल यह कलश पूना में उनके निवास पर उनकी अन्तिम इच्छा के मुताबिक सुरक्षित रखा हुआ है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;15 नवम्बर 1950 से आज तक प्रत्येक 15 नवम्बर को गोड़से का “शहीद दिवस” मनाया जाता है। सबसे पहले गोड़से और आपटे की तस्वीरों को अखंड भारत की तस्वीर के साथ रखकर फ़ूलमाला पहनाई जाती है। उसके पश्चात जितने वर्ष उनकी मृत्यु को हुए हैं उतने दीपक जलाये जाते हैं और आरती होती है। अन्त में उपस्थित सभी लोग यह सौगन्ध खाते हैं कि वे गोड़से के “अखंड हिन्दुस्तान” के सपने के लिये काम करते रहेंगे। गोपाल गोड़से अक्सर कहा करते थे कि यहूदियों को अपना राष्ट्र पाने के लिये 1600 वर्ष लगे, हर वर्ष वे कसम खाते थे कि “अगले वर्ष यरुशलम हमारा होगा…”&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हालांकि यह एक छोटा सा कार्यक्रम होता है, और उपस्थितों की संख्या भी कम ही होती है, लेकिन गत कुछ वर्षों से गोड़से की विचारधारा के समर्थन में भारत में लोगों की संख्या बढ़ी है, जैसे-जैसे लोग नाथूराम और गाँधी के बारे में विस्तार से जानते हैं, उनमें गोड़से धीरे-धीरे एक “आइकॉन” बन रहे हैं। वीर सावरकर जो कि गोड़से और आपटे के राजनैतिक गुरु थे, के भतीजे विक्रम सावरकर कहते हैं, कि उस समय भी हम हिन्दू महासभा के आदर्शों को मानते थे, और “हमारा यह स्पष्ट मानना है कि गाँधी का वध किया जाना आवश्यक था…”, समाज का एक हिस्सा भी अब मानने लगा है कि नाथूराम का वह कृत्य एक हद तक सही था। हमारे साथ लोगों की सहानुभूति है, लेकिन अब भी लोग खुलकर सामने आने से डरते हैं…।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;डर की वजह भी स्वाभाविक है, गाँधी की हत्या के बाद कांग्रेस के लोगों ने पूना में ब्राह्मणों पर भारी अत्याचार किये थे, कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने संगठित होकर लूट और दंगों को अंजाम दिया था, उस वक्त पूना पहली बार एक सप्ताह तक कर्फ़्यू के साये में रहा। बाद में कई लोगों को आरएसएस और हिन्दू महासभा का सदस्य होने के शक में जेलों में ठूंस दिया गया था (कांग्रेस की यह “महान” परम्परा इंदिरा हत्या के बाद दिल्ली में सिखों के साथ किये गये व्यवहार में भी दिखाई देती है)। गोपाल गोड़से की पत्नी श्रीमती सिन्धु गोड़से कहती हैं, “वे दिन बहुत बुरे और मुश्किल भरे थे, हमारा मकान लूट लिया गया, हमें अपमानित किया गया और कांग्रेसियों ने सभी ब्राह्मणों के साथ बहुत बुरा सलूक किया… शायद यही उनका गांधीवाद हो…”। सिन्धु जी से बाद में कई लोगों ने अपना नाम बदल लेने का आग्रह किया, लेकिन उन्होंने दृढ़ता से इन्कार कर दिया। “मैं गोड़से परिवार में ब्याही गई थी, अब मृत्यु पर्यन्त यही मेरा उपनाम होगा, मैं आज भी गर्व से कहती हूँ कि मैं नाथूराम की भाभी हूँ…”।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चम्पूताई आपटे की उम्र सिर्फ़ 14 वर्ष थी, जब उनका विवाह एक स्मार्ट और आकर्षक युवक “नाना” आपटे से हुआ था, 31 वर्ष की उम्र में वे विधवा हो गईं, और एक वर्ष पश्चात ही उनका एकमात्र पुत्र भी चल बसा। आज वे अपने पुश्तैनी मकान में रहती हैं, पति की याद के तौर पर उनके पास आपटे का एक फ़ोटो है और मंगलसूत्र जो वे सतत पहने रहती हैं, क्योंकि नाना आपटे ने जाते वक्त कहा था कि “कभी विधवा की तरह मत रहना…”, वह राजनीति के बारे में कुछ नहीं जानतीं, उन्हें सिर्फ़ इतना ही मालूम है गाँधी की हत्या में शरीक होने के कारण उनके पति को मुम्बई में हिरासत में लिया गया था। वे कहती हैं कि “किस बात का गुस्सा या निराशा? मैं अपना जीवन गर्व से जी रही हूँ, मेरे पति ने देश के लिये बलिदान दिया था।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;12 जनवरी 1948 को जैसे ही अखबारों के टेलीप्रिंटरों पर यह समाचार आने लगा कि पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपये देने के लिये सरकार पर दबाव बनाने हेतु गाँधी अनशन पर बैठने वाले हैं, उसी वक्त गोड़से और आपटे ने यह तय कर लिया था कि अब गाँधी का वध करना ही है… इसके पहले नोआखाली में हिन्दुओं के नरसंहार के कारण वे पहले से ही क्षुब्ध और आक्रोशित थे। ये दोनों, दिगम्बर बड़गे (जिसे पिस्तौल चलाना आता था), मदनलाल पाहवा (जो पंजाब का एक शरणार्थी था) और विष्णु करकरे (जो अहमदनगर में एक होटल व्यवसायी था), के सम्पर्क में आये।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पहले इन्होंने गांधी वध के लिये 20 जनवरी का दिन तय किया था, गोड़से ने अपनी इंश्योरेंस पॉलिसी में बदलाव किये, एक बार बिरला हाऊस जाकर उन्होंने माहौल का जायजा लिया, पिस्तौल को एक जंगल में चलाकर देख लिया, लेकिन उनके दुर्भाग्य से उस दिन बम तो बराबर फ़ूटा, लेकिन पिस्तौल न चल सकी। मदनलाल पाहवा पकड़े गये (और यदि दिल्ली पुलिस और मुम्बई पुलिस में बराबर तालमेल और खुफ़िया सूचनाओं का लेनदेन होता तो उसी दिन इनके षडयन्त्र का भंडाफ़ोड़ हो गया होता)। बाकी लोग भागकर वापस मुम्बई आ गये, लेकिन जब तय कर ही लिया था कि यह काम होना ही है, तो तत्काल दूसरी ईटालियन मेड 9 एमएम बेरेटा पिस्तौल की व्यवस्था 27 जनवरी को ग्वालियर से की गई। दिल्ली वापस आने के बाद वे लोग रेल्वे के रिटायरिंग रूम में रुके। शाम को आपटे और करकरे ने चांदनी चौक में फ़िल्म देखी और अपना फ़ोटो खिंचवाया, बिरला मन्दिर के पीछे स्थित रिज पर उन्होंने एक बार फ़िर पिस्तौल को चलाकर देखा, वह बेहतरीन काम कर रही थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गाँधी वध के पश्चात उस समय समूची भीड़ में एक ही स्थिर दिमाग वाला व्यक्ति था, नाथूराम गोड़से। गिरफ़्तार होने के पश्चात गोड़से ने डॉक्टर से उसे एक सामान्य व्यवहार वाला और शांत दिमाग होने का सर्टिफ़िकेट माँगा, जो उसे मिला भी। बाद में जब अदालत में गोड़से की पूरी गवाही सुनी जा रही थी, पुरुषों के बाजू फ़ड़क रहे थे, और स्त्रियों की आँखों में आँसू थे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;बहरहाल, पाकिस्तान को नेस्तनाबूद करने और टुकड़े-टुकड़े करके भारत में मिलाने हेतु कई समूह चुपचाप काम कर रहे हैं, उनका मानना है कि इसके लिये साम-दाम-दण्ड-भेद हरेक नीति अपनानी चाहिये। जिस तरह सिर्फ़ साठ वर्षों में एक रणनीति के तहत कांग्रेस, जिसका पूरे देश में कभी एक समय राज्य था, आज सिमट कर कुछ ही राज्यों में रह गई है, उसी प्रकार पाकिस्तान भी एक न  एक दिन टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जायेगा और उसे अन्ततः भारत में मिलना होगा, और तब गोड़से का अस्थि विसर्जन किया जायेगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(एक ब्लाग से लिया गया है, यह लेखक का मत नहीं है)&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-7837438041625587595?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/7837438041625587595/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=7837438041625587595' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/7837438041625587595'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/7837438041625587595'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2008/08/blog-post_18.html' title='एक पहलू यह भी.....................'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-6421755928067566822</id><published>2008-08-04T04:25:00.000-07:00</published><updated>2008-08-04T04:27:02.948-07:00</updated><title type='text'>गांधी उवाच</title><content type='html'>&lt;a name="OLE_LINK2"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a name="OLE_LINK1"&gt;गांधी उवाच&lt;/a&gt;&lt;br /&gt;'गांधीवाद' जैसी कोई चीज नहीं है, और मैं अपने बाद कोई संप्रदाय छोड़ कर जाना नहीं चाहता। मैं यह दावा नहीं करता कि मैंने किसी नये सिद्धांत को जन्म दिया है। मैंने तो सनातन सत्यों को अपने दैनंदिन जीवन और समस्याओं के समाधान में अपने ढंग से लागू करने का प्रयास भर किया है.....&lt;br /&gt;दुनिया को सिखाने के लिए मेरे पास कोई नयी बात नहीं है। सत्य और अहिंसा उतने ही पुराने हैं जितने पर्वत। मैंने केवल इन दोनों को लेकर बड़े-से-बड़े पैमाने पर प्रयोग करने का प्रयास किया है। ऐसा करते समय मुझसे गलतियां हुई हैं और इन गलतियों से मैंने सबक लिया है। इस प्रकार, जीवन और उसकी समस्याओं ने मेरे लिए सत्य और अहिंसा पर आचरण के अनेक प्रयोगों का रूप ले लिया है।&lt;br /&gt;स्वभाव से मैं सत्यवादी हूं, अहिंसक नहीं। जैसा कि किसी जैन मुनि ने एक बार ठीक ही कहा था, मैं अहिंसा का उतना पक्षधर नहीं हूं जितना कि सत्य का और मैं सत्य को प्रथम स्थान देता हूं और अहिंसा को द्वितीय । क्योंकि, जैसा कि उन मुनि ने कहा, मैं सत्य के लिए अहिंसा की बलि दे सकता हूं। दरअसल, अहिंसा को मैंने सत्य की खोज करते हुए पाया है।&lt;br /&gt;अगर गांधीवाद भ्रांति पर आधारित है तो उसका नष्ट हो जाना ही उचित है। सत्य और अहिंसा कभी नष्ट नहीं होंगे किंतु यदि गांधीवाद किसी पंथ-संप्रदाय का पर्याय है तो उसका नष्ट हो जाना ही उचित है। यदि मुझे अपनी मृत्यु के बाद पता चले कि मैं जिन आदर्शों के लिए जिया, उनका कोई पंथ-संप्रदाय बन गया है तो मुझे गहरी वेदना होगी....।&lt;br /&gt;कोई यह न कहे कि वह गांधी का अनुगामी है। अपना अनुगमन मैं स्वयं करूं, यही काफी है। मुझे पता है, मैं अपना कितना अपूर्ण अनुगामी हूं, क्योंकि मैं अपनी आस्थाओं के अनुरूप जी नहीं पाता। आप मेरे अनुगामी नहीं हैं बल्कि सहपाठी हैं, सहयात्री हैं, सहखोजी हैं और सहकर्मी हैं।&lt;br /&gt;मैंने भारत के सामने आत्मत्याग के प्राचीन नियम को प्रस्तुत करने का जोखिम उठाया है। वस्तुतः सत्याग्रह और उसकी शाखा-प्रशाखा-असहयोग और सविनय प्रतिकार, और कुछ नहीं हैं, सिवाय आत्मतप एवं कष्ट सहन के नियमों के नये नामों के।&lt;br /&gt;वे ऋषि न्यूटन से भी अधिक प्रतिभाशाली थे जिन्होंने हिंसा के बीच रहते हुए अहिंसा के नियम की खोज की। वे वेलिंग्टन से भी बड़े योद्धा थे कि अत्रों के प्रयोग के ज्ञाता होने पर भी जिन्होंने उनकी व्यर्थता को पहचाना और परेशान दुनिया को सिखाया कि उसकी मुक्ति हिंसा में नहीं अपितु अहिंसा में निश्चित है।&lt;br /&gt;अपनी गत्यात्मक स्थिति में, अहिंसा का अर्थ है विवेकपूर्वक कष्ट-सहन। इसका अर्थ अत्याचारी की इच्छा के समक्ष कायर समर्पण नहीं है, बल्कि इसका अर्थ है अत्याचारी की इच्छा के विरुद्ध अपनी पूरी आत्मिक शक्ति से उठ खड़े होना। इस नियम पर चलते हुए कोई आदमी अकेला ही अपने सम्मान, अपने धर्म और अपनी आत्मा की रक्षा के लिए किसी अन्यायी साम्राज्य की समूची शक्ति को चुनौती दे सकता है और उस साम्राज्य के पतन अथवा नवजीवन की नींव रख सकता है।&lt;br /&gt;अतः मैं भारत से अहिंसा के मार्ग पर चलने का अनुरोध इसलिए नहीं कर रहा कि वह कमजोर है। मैं चाहता हूं कि वह अपने बल और अपनी शक्ति के प्रति सचेत रहते हुए अहिंसा का आचरण करे। भारत को अपने बल को पहचानने के लिए हथियारों के प्रशिक्षण की जरूरत नहीं है। हमें इसकी जरूरत इसलिए महसूस होती है कि हम अपने को केवल हाड़-मांस का ढेर समझते हैं।&lt;br /&gt;मैं चाहता हूं कि भारत को इसका बोध हो कि उसकी एक आत्मा है जो अविनाशी है और जो प्रत्येक भौतिक दुर्बलता से उपर उठकर विजयी हो सकती है और समस्त संसार के भौतिक बल का चुनौती दे सकती है।&lt;br /&gt;मेरा जीवन-लक्ष्य केवल भारतवासियों में बंधुत्व की स्थापना करना नहीं है। मेरा लक्ष्य केवल भारत की आजादी नहीं है, यद्यपि इसमें संदेह नहीं कि आज मेरा लगभग संपूर्ण जीवन और पूरा समय इसी में लगा है। किंतु, भारत की आजादी के जरिए, मैं विश्वबंधुत्व के लक्ष्य को प्राप्त करना चाहता हूं।&lt;br /&gt;मेरी देशभक्ति कोई व्यावर्तक वस्तु नहीं है। यह सर्वसमावेशी है और मैं उस देशभक्ति को त्याग दूंगा जो अन्य राष्टों को व्यथित अथवा शोषित करके अपनी प्रबलता सिद्ध करने का प्रयास करे। देशभक्ति के मेरे विचार की यदि निरपवाद रूप से समस्त मानवता के अधिकाधिक कल्याण के साथ संगति न हो तो वह बेकार है।&lt;br /&gt;यही नहीं, मेरा धर्म और धर्म से व्युत्पन्न मेरी देशभक्ति समस्त जीवन को परिव्याप्त करती है। मैं केवल मानवों के साथ ही तादात्म्य अथवा बंधुत्व स्थापित करना नहीं चाहता, अपितु पृथ्वी पर रेंगने वाले कीड़े-मकोड़ों के साथ भी तादात्म्य अथवा बंधुत्व स्थापित करना चाहता हूं.... क्योंकि हम यह मानते हैं कि हम सब उसी ईश्वर की संतान हैं और इसलिए, जीवन जिस रूप में भी दिखाई देता है, तत्वतः एक ही होना चाहिए।&lt;br /&gt;मुझे अपने जीवन-लक्ष्य में इतनी गहरी आस्था है कि यदि उसकी प्राप्ति में सफलता मिलती है-और मिलना अवश्यंभावी है- तो इतिहास में यह बात दर्ज होगी कि यह आंदोलन विश्व के सभी लोगों को एक सूत्र में पिरोने के लिए था जो एक-दूसरे के विरोधी नहीं बल्कि एक समष्टि के अंग होंगे।&lt;br /&gt;विदेश भ्रमण&lt;br /&gt;पता नहीं क्यों, मुझे युरोप और अमरीका जाने में भय लगता है। इसलिए नहीं कि मुझे अपने देशवासियों की अपेक्षा उनका अविश्वास अधिक है, पर इसलिए कि मुझे स्वयं पर विश्वास नहीं है। मुझे स्वास्थ्य सुधारने अथवा देशभ्रमण के लिए पश्चिम की यात्रा करने की कोई कामना नहीं है। मुझे सार्वजनिक भाषण देने की भी कामना नहीं है। मुझे महिमामंडित किया जाए, इसे मैं कतई पसंद नहीं करता। मेरे ख्याल से मुझमें सार्वजनिक भाषण देने और सार्वजनिक प्रदर्शनों में भाग लेने के भीषण तनावों को झेलने लायक शारीरिक क्षमता अब शायद ही फिर से आ पाये।&lt;br /&gt;यदि ईश्वर कभी मुझे पश्चिम की यात्रा पर भेजे तो मैं वहां की जनता के हृदयों में पैठने, युवावर्ग से शांतिपूर्वक बातचीत करने और अपने सदृश लोगों से - वे लोग जो सत्य के अलावा बाकी किसी भी कीमत पर शांति चाहते हैं - मिलने को सौभाग्य प्राप्त करने के लिए जाना चाहूंगा।&lt;br /&gt;लेकिन मैं अनुभव करता हूं कि अभी मेरे पास पश्चिम को व्यक्तिगत रूप से देने के लिए कोई संदेश नहीं है। मेरा विश्वास है कि मेरा संदेश सार्वभौम है, पर मैं अभी यह अनुभव करता हूं कि मैं अपने ही देश में काम करके इसे ज्यादा अच्छी तरह पहुंचा सकता हूं। यदि मैं भारत में प्रत्यक्ष सफलता प्रदर्शित कर सकूं तो मेरा संदेश पूरी तरह लोगों तक पहुंच जाएगा।&lt;br /&gt;यदि मैं इस नतीजे पर पहुंचता हूं कि भारत के लिए मेरे संदेश का कोई उपयोग नहीं है तो उसके प्रति आस्था होने पर भी मुझे अन्य श्रोताओं तक उसे पहुंचाने के लिए कहीं बाहर जाने की फिव् नहीं करनी चाहिए। अगर मैं बाहर जाउंगा तो मुझे पहले इस बात का विश्वास होना चाहिए, चाहे सबकी तसल्ली के लायक मैं उसका प्रमाण न दे सकूं, कि मेरा संदेश भारत में ग्रहण किया जा रहा है, भले ही उसकी गति बिलकुल धीमी हो।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-6421755928067566822?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/6421755928067566822/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=6421755928067566822' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/6421755928067566822'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/6421755928067566822'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2008/08/blog-post_04.html' title='गांधी उवाच'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-6302391229158937029</id><published>2008-08-01T02:33:00.000-07:00</published><updated>2008-08-01T02:34:54.332-07:00</updated><title type='text'>गांधी हत्या रहस्य</title><content type='html'>नाथूराम गोडसे और नारायण आप्टे दोनों ने मिलकर फैसला किया था कि महात्मा गांधी को मार दिया जाए। लेकिन दोनों में किसके जहन में यह साजिश आई थी, यह अब तक रहस्य बना हुआ है।&lt;br /&gt;महात्मा गांधी की 60वीं पुण्यतिथि पर जारी होने वाली एक किताब में कहा गया है कि यह अब तक रहस्य है कि दोनों में से किसने यह साजिश रची थी। दोनों ने यह फैसला तब किया था जब खबर आई थी कि गांधी ने पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने की वकालत की है।&lt;br /&gt;गोडसे और आप्टे दोनों ने पूना में एक अखबार के दफ्तर में टेलीप्रिंटर पर यह खबर पढ़ी और फैसला किया कि गांधी की हत्या कर दी जाए। लेकिन यह आज तक पता नहीं चला कि दोनों में से यह साजिश किसने पहले रची क्योंकि इसके बाद गांधी के हत्यारे के रूप में सिर्फ एक ही नाम सामने आता रहा गोडसे।&lt;br /&gt;यह लिखा गया है कि मनोहर मलगांवकर की आने वाली किताब के नए संस्करण द मैन हू किल्ड गांधी में। 94 वर्षीय मनोहर ने इस किताब का पहला संस्करण 1978 में प्रकाशित किया गया था। इस नए संस्करण में फोटो और वे दस्तावेज भी शामिल किए गए हैं जिनमें गोडसे और आप्टे के इस हत्या के मिशन पर होने के सबूत हैं जैसे बॉम्बे-दिल्ली एयर टिकट और होटल के बिल आदि।&lt;br /&gt;लेखक के अनुसार छह लोग महात्मा की हत्या की साजिश में शामिल थे जिनमें से दो को फांसी दी गई। अन्य चार बडगे, करकरे, गोपाल और मदनलाल को उम्र कैद की सजा दी गई थी। लेखक का दावा है कि इन चारों ने उनसे इस साजिश के बारे में खुलकर बात की है और ऐसे तथ्यों का खुलासा किया है जो लोगों को आज तक नहीं पता।&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-6302391229158937029?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/6302391229158937029/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=6302391229158937029' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/6302391229158937029'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/6302391229158937029'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2008/08/blog-post_01.html' title='गांधी हत्या रहस्य'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-463807583966946852</id><published>2008-08-01T02:19:00.000-07:00</published><updated>2008-08-01T02:22:48.150-07:00</updated><title type='text'>महात्मा के अंतिम शब्द हे राम</title><content type='html'>&lt;a name="OLE_LINK2"&gt;&lt;/a&gt;&lt;a name="OLE_LINK1"&gt;हे राम   ... हे राम ... हे राम  &lt;/a&gt;&lt;br /&gt; &lt;br /&gt;महात्मा के विचारों को आज भी प्रासंगिक माना जाता है &lt;br /&gt;साठ साल पहले 30 जनवरी, 1948 के ही दिन दिल्ली के बिड़ला भवन में नाथूराम गोडसे महात्मा गाँधी के पैर छूने के लिए झुका.... और जब उठा तो उसने एक के बाद एक तीन गोलियाँ महात्मा के सीने में दाग़ दीं थीं.&lt;br /&gt;अब तक माना जाता है कि गोली लगने के बाद बापू 'हे राम!' कहते हुए गिरे थे और यह शब्द उनके पास चल रही उनकी पोती आभा ने सुने थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन एक नई पुस्तक 'महात्मा गांधी: ब्रह्मचर्य के प्रयोग' में बापू के अंतिम शब्द ‘हे राम’ पर सवाल उठाया गया है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पत्रकार दयाशंकर शुक्ल सागर की पुस्तक में दावा किया है कि 30 जनवरी, 1948 को गोली लगने के बाद महात्मा गांधी के मुख से निकलने वाले अंतिम शब्द ‘हे राम’ नहीं थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पुस्तक के अनुसार 30 जनवरी, 1948 को जब नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी को गोली मारी थी तो बापू के सबसे क़रीब उनकी पौत्र वधु मनु गांधी थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उन्होंने बापू के होठों से अंतिम शब्द ‘हे रा...’ सुनाई दिया था इसलिए मान लिया गया कि उनके अंतिम शब्द ‘हे राम’ थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;नई पुस्तक में कहा गया है कि मनु के दिमाग में ये शब्द इसलिए आए क्योंकि उनके अवचेतन मन में नोआखली में महात्मा गांधी की कही हुई यह बात गूंज रही थी कि '' यदि मैं रोग से मरूँ तो मान लेना कि मै इस पृथ्वी पर दंभी और रावण जैसा राक्षस था. मैं राम नाम रटते हुए जाऊं तो ही मुझे सच्चा ब्रह्मचारी, सच्चा महात्मा मानना.''&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;किताब के अनुसार महात्मा गांधी के निजी सचिव प्यारेलाल का भी मानना था कि गांधीजी ने मूर्छित होते समय जो शब्द निकले थे वे 'हे राम' नहीं थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;उनका कहना था कि महात्मा गांधी के अंतिम शब्द 'राम राम' थे. ये कोई आह्वान नहीं था बल्कि सामान्य नाम स्मरण था.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जानी-मानी गांधीवादी निर्मला देशपांडे ने इस बात से असहमति जताई है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्मला गांधी का कहना था कि उस शाम बापू जब बिड़ला मंदिर में प्रार्थना के लिए जा रहे थे तब उनके दोनों ओर आभा और मनु थीं. आभा बापू की पौत्री और मनु उनकी पौत्रवधु थीं.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;निर्मला गांधी का कहना है कि जब बापू को गोली लगी थी तब उनके हाथ आभा और मनु के कंधों पर थे.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गोली लगने के बाद वे आभा की ओर गिरे थे. आभा ने स्पष्ट सुना था कि बापू के मुंह से आख़िरी बार ‘हे राम’ ही निकला था.&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/8193914156249227386-463807583966946852?l=gandhiwadi.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/feeds/463807583966946852/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=8193914156249227386&amp;postID=463807583966946852' title='0 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/463807583966946852'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/8193914156249227386/posts/default/463807583966946852'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://gandhiwadi.blogspot.com/2008/08/blog-post.html' title='महात्मा के अंतिम शब्द हे राम'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-8193914156249227386.post-194412847304946357</id><published>2008-07-31T05:49:00.000-07:00</published><updated>2008-07-31T06:11:01.544-07:00</updated><title type='text'>गांधी गाथा </title><content type='html'>गांधी एक ऐसा नाम जो पूरे विश्व में एक नई क्रांति का प्रतीक बन गया, लेकिन अब इसे नई पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए बम्बइया भाई ने मुन्ना बन कर जिम्मेदारी उठाई। यह एक सराहनीय प्रयास है। आखिर फिल्मकार व इसके पटकथा लेखक भी बुद्धिजीवी हैं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;फिल्म में गांधीगिरी करते मुन्ना व सर्किट हमारा मनोरंजन भरपूर करते हैं, जाने-अनजाने में हमें उस लाठीधारी लंगोटीवाले के बारे में भी बताने से नहीं चूकते।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आज की पीढ़ी इस तरफ शायद ही सोचती होगी कि गांधी विलायती बाबू भी थे। विदेशों में उनका पोशाक अंग्रेजों की तरह हुआ करता था। उस युग में भी वे अपनी बातों को जोरदार तरीके से पहुंचा पाते थे। उस समय लाखों लोगों को एक सूत्र में पिरोने की ताकत (कला) उनमें थी।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आधुनिक युग में कुछ नेता (स्वयंभू) उन पर तरह-तरह का लांछन लगाने से भी नहीं चूकते।  कुछ उन्हें पाक समर्थक भी कहते दिखते हैं, लेकिन राम कृष्ण के इस देश में तो लोगों ने अपने भगवान को भी नहीं बख्शा, फिर आधुनिक युग के इस प्रणेता को कैसे छोड़ दें। गांधी के बारे में जितना कहा जाए वह कम है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt; नाम की महत्ता तो हमारे पुराणों में भी वर्णित है। राम, कृष्ण की रट लगाते हम थकते नहीं। इससे हमें आत्मबल मिलता है। गांधी का नाम भी हमें गौरवान्वित करता है। हमें बल देता है। गांधी नाम के प्रति अभी भी हमारा देश अपनी कृतज्ञता ज्ञापन करता है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधी गाथा जारी रहेगी .. ..   .. .. .. .. ..&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अपना सुझाव भले ही अपशब्द हो, सलीकेदार भाषा में प्रेषित करना न भूलें।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;गांधीवादी &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;strong&gt;&lt;/strong&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' 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&lt;/strong&gt;'/><author><name>Lokenath</name><uri>http://www.blogger.com/profile/09046620392674533202</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='24' height='32' src='http://3.bp.blogspot.com/_3kbs3m5ZDy0/SR133hlxReI/AAAAAAAAABo/ZvJKgMg9iSw/S220/loknath02.jpg'/></author><thr:total>0</thr:total></entry></feed>
